मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन - Aksharang
  • २०७८ जेठ ४ मङ्गलबार

मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन

डा.श्वेता दीप्ति

डा.श्वेता दीप्ति

ईश्वर किसी एक जाति या धर्म के बंधन से बंधे हए नहीं हैं । ये हम हैं कि इन्हें हम विभिन्न बंधनों में बाँधते हैं । किन्तु साहित्य ऐसे बंधनों से प्रायः मुक्त होता है शायद इसलिए कई गीतकार, गायक और कवि ऐसे हुए हैं जिन्होंने इस बंधन को तोड़ते हुए ईश्वर की अराधना अपने काव्य के माध्यम से की है । ऐसे ही एक कवि रसखान हैं । हिन्दी साहित्य के मध्ययुगीन कृष्णा भक्त कवियों में रसपान की कृष्ण भक्ति की लोकप्रियता निर्विवाद है । बोधा और आलम के अलावा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिन मुसलमान कवियों के लिए कहा था कि इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए, उनमें रसखान का नाम सबसे ऊपर है । मुसलमान होते हुए भी रसखान कृष्ण की गति में से डूबे कि वे हिन्दू और मुसलमान के बीच के अंतरों को भूल गए ।
कृष्ण भक्त रसखान मुस्लिम थे । इनके काव्य में भक्ति और शृंगार रस दोनों प्रमुखता से मिलते हैं। वे कृष्ण के सगुण और निर्गुण दोनों रूपों के प्रति श्रद्धा रखते हैं । रसखान के सगुण कृष्ण रूप कृष्ण लीला में प्रचलित बाल लीला रास, फाग लीला, कुज लीला आदि सभी प्रचलित लीलाएँ करते हैं । उन्होने अपने काव्य की परिधि में इन सभी असीमित लीलाओं को बाँध डाला है ।
किंवदंतियों के अनुसार पठान कुल में जन्मे रसखान को माता पिता का स्नेह व सुख वैभव सभी कुछ उपलब्ध था । एक बार कहीं भगवत कथा का आयोजन हो रहा था । व्यास गद्दी पर बैठे कथा वाचक भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन कर रहे थे । उनके समीप ही भगवान श्रीकृष्ण का एक चित्र रखा था । रसखान भी उस आयोजन में पहुंचे ।
व्यास जी के समीप रखे कृष्णा के चित्र पर उन के दृष्टि पड़ी तो वे जैसे मुर्ति बनकर रह गए कथा की समाप्ति तक रसखान एकटक उस चित्र को निहारते रहे। चित्र देखकर वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने व्यास पीठ पर बैठे कथावाचक से भगवान श्रीकृष्ण के बारे में पूछा और उनकी खोज में ब्रज की ओर चले गए ।
और फिर आजन्म श्रीकृष्ण में ही मगन रहे । रसखान कहते थे, मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो ताकि मेरी जिव्हा को रस मिले। मुझे अपने कुंज कुटीरों में झाडू लगा लेने दो ताकि मेरे हाथ सदा अच्छे कर्म कर सकें। ब्रज की धूल से अपना शरीर संवार कर मुझे आठों सिध्दियों का सुख लेने दो। और यदि निवास के लिये मुझे विशेष स्थान देना ही चाहते हो प्रभु तो यमुना किनारे कदम्ब की डालों से अच्छी जगह तो कोई हो ही नहीं, जहाँ आपने अनेकों लीलाएं रची हैं।
रसखान के कृष्ण की बाललीला में उनके बचपन की अनेकों झाँकियां हैं ।
‘धूरि भरै अति सोभित स्याम जु तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी ।
खेलत खात फिरै अँगना पग पैंजनी बाजती पीरी कछौटी ।।
वा छवि को रसखान विलोकत बारत काम कला निज कोठी ।
काग के भाग बडे सजनी हरि हाथ सौं ले गयो रोटी। ।’

बालक श्यामजू का धूल से सना शरीर और सर पर बनी सुन्दर चोटी की शोभा देखने लायक है । और वे पीले वस्त्रों में, पैरों में पायल बांध माखन रोटी खेलते खाते घूम रहे हैं । इस छवि पर रसखान अपनी कला क्या, सब कुछ निछावर कर देना चाहते हैं । तभी एक कौआ आकर उनके हाथ से माखन-रोटी ले भागता है तो रसखान कह उठते हैं कि देखो इस निकृष्ट कौए के भाग्य भगवान के हाथ की रोटी खाने को मिली है ।
कृष्ण के प्रति रसखान का प्रेम स्वयं का तो है ही मगर वह गोपियों का प्रेम बन कृष्ण की बाल्यावस्था से यशोदा नन्द बाबा के प्रेम से आगे जा समस्त ब्रज को अपने प्रेम में डुबो ले जाता है । उनकी शरारतों की तो सीमा नहीं । वे गोपियों को आकर्षित करने के लिये विविध लीलाएं करते हैं जैसे कभी बाँसुरी के स्वरों से किसी गोपी का नाम निकालते हैं । कभी रास रचते हैं, कभी प्रेम भरी दृष्टि से बींध देते हैं ।
रसखान के भक्ति काव्य में अलौकिक निगुर्ण कृष्ण भी विद्यमान हैं । वे कहते हैं-
संभु धरै ध्यान जाकौ जपत जहान सब,
ताते न महान और दूसर अब देख्यौ मैं।
कहै रसखान वही बालक सरूप धरै,
जाको कछु रूप रंग अबलेख्यौ मैं।
कहा कहूँ आली कुछ कहती बनै न दसा,
नंद जी के अंगना में कौतुक एक देख्यौ मैं।
जगत को ठांटी महापुरुष विराटी जो,
निरजंन, निराटी ताहि माटी खात देख्यौ मैं।

शिव स्वयं जिसे अराध्य मान उनका ध्यान करते हैं, सारा संसार जिनकी पूजा करता है, जिससे महान कोई दूसरा देव नहीं । वही कृष्ण साकार रूप धार कर अवतरित हुआ है और अपनी अद्भुत लीलाओं से सबको चौंका रहा है । यह विराट देव अपनी लीला के कौतुक दिखाने को नंद बाबा के आंगन में मिट्टी खाता फिर रहा है ।
जिस कृष्ण के गुणों का गुणगान गुनिजन, अप्सरा, गंर्धव और स्वयं नारद और शेषनाग सभी करते हैं । गणेश जिनके अनन्त नामों का जाप करते हैं, ब्रह्मा और शिव भी जिसके स्वरूप की पूर्णता नहीं जान पाते, जिसे प्राप्त करने के लिये योगी, यति, तपस्वी और सिध्द निरतंर समाधि लगाए रहते हैं, फिर भी उस परब्रह्म का भेद नहीं जान पाते । उन्हीं के अवतार कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ थोडी सी छाछ के कारण दस बातें बनाती हैं और नाच नचाती हैं-
जोगी जती तपसी अरु सिध्द निरन्तर जाहि समाधि लगावत।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत।।

रसखान के कृष्ण अलौकिक हैं, परन्तु उस सभी गुण से परिपूर्ण हैं जो अपने भक्तों को आनन्दित करते हैं । अपूर्व, अद्वितीय कृष्ण जिन्होंने रसखान को अपने रस में डुबो लिया था और रसखान श्रीकृष्ण के होकर ही रह गए थे ।


(डा. श्वेता दीप्ति त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य की उप-प्राध्यापक हैँ)
shwetadeepti1810@gmail.com