• २०८३ जेष्ठ १०, आईतवार

रिश्तेः एक खूबसूरत एहसास

पुष्पलता ‘पुष्प’

पुष्पलता ‘पुष्प’

रिश्ता ! एक खूबसूरत सा शब्द,
एक नाम है
जिसका भार शायद !
हर कोई न उठा पाता हो ?
वहाँ मैं जानें
कितने ही
रिश्तों के
वजन को
उठा रही हूँ

बोझ नहीं कहूँगी
क्यों कि अभी तो
मैं उन्हें संभाले हूँ

जाने कितने ही
रिश्ते
अपना अपना
रूप लिये
अपनी अपनी
शक्ल लिये
मेरे मन की
तिजोरी में
बंद पड़े हैं
कभी जब
उन्हें देखती हूँ
वो सर उठाये
मुझे देख रहे होते हैं
कुछ की जुबां पर
सवाल होते हैं
और कुछ
अपनी जरूरतों में
मुझे शामिल न पाकर
खामोश पड़े होते हैं
और कुछ तो
अपनी अकड़ में
अकड़ गये
और कुछ ने
अपने मुनाफे के लिये
बुराई का नाम दें दिया

शायद ! वो नहीं जानते
उनकी तासीर !
उनकी खूसबु !
जब भी मैं
वो तिजोरी को खोलती हूँ
सोचती हूँ,
क्या मैंने उन्हें
कैद करके रखा है ?
या मैं खुद कैद हो गई हूँ ?
क्यों रखे हैं
मैंने वो ‘रिश्ते’ संभाल के


(स्वतंत्र लेखन, कविता की दो पुस्तक प्रकाशित, नई दिल्ली, भारत)
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