चांद छुप गया सितारे टूट गये - Aksharang
  • २०७८ असार ५ शनिवार

चांद छुप गया सितारे टूट गये

उदय निरौला

उदय निरौला

चांद छुप गया
सितारे टूट गये
मगर तुम्हारी झलक
आंखों के बिम्ब मे छपी रह गई
आइने में तुम
परछाइयों में तुम
न जाने मेरे दिल के खयाल
मुझे क्यों ले जाते हैं दूर दूर
फिसल जाते हैं राहों में
पिघल जाते हैं इरादे
मगर वैसे के वैसे रह जाते हैं अतित के साये
वर्तमान बिखरा हुआ है
मगर तुम नहीं,
दूर होते हुएभी दूर नहीं
भूलेंगे कैसे ये परछाइयाँ
ना समझकी समझमें
सितारे चमके और टुटे
साथ न होते हुएभी सपने ना टुटे
क्यों ?
मुराद नाबिखरे
तमन्नाना फुटे
चलते चलते राहें तुम्हारी बदल गयीं
मगर मैं हुँ वैसे ही
नातोंपथ बदला और ना दिल
शीतकी बूँद- बूँद में
सूर्यकी हर किरण में
झांकता हूँ
क्यों ?
आखिरकार नातुम नाहम
मगर सताते रहते हैं ये चांद ये सितारें
ये हवाएँ बेवजह ये हवाएँ ।

कैसी खामोशी है ये
दिल के आइने में
कोलाहल सी शहनाई बज रही है
गूंज उठते नाद बेवजह
ना सो सकते नाही सुन सकते
शून्य के बजाय
सन्नाटे बाकी है
साया रोंगटे खड़े कर देता हैं ।
०००
चांदकी गहराई में
सितारों की उंचाई में

चिन्तन होना चाहिये था
मगर बेचैन तड़प रहे हैं
घिर रहे हैं बादल
घोर सन्नाटा छा रहा हैं
बेवजह बेवजह
खासियत खोटे
वर्तमान मरघट
बची सिर्फ खामोशी
बचे तो बचे
मगर क्या है ये हवाजो ले आती हैं  रोदन
तड़पन और ये वर्तमान छुट जाते हैं
ना टूटे चांद
ना टूटे सितारें
मगर टूटे दिल
क्याकरूँ क्याकरूँ ?


(निरौला नेपाल के स्थापित साहित्यकार हैं)
udayarajniroula@gmail.com