निःशब्द सूं - Aksharang
  • २०७८ मंसिर १३ सोमबार

निःशब्द सूं

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

निःशब्द
इसो सशक्त शब्द है
जींको कोई शब्द मं अनुवाद कोनीं हु सकै,
जीवन बी मनै इसो ई लागै
न रंग न आकार
कोई अर्थ म कदेइ परिभाषित नीं हुणै वालो ।

तूं फूल-
के बोलसी अणै ?
शब्द है या निःशब्द ?
बोली कोनीं
पण के बोल कोनीं रयो के यो ?
यो ई है बो महान शब्द
जो किणी बोली सूं अव्यक्त नीं हु सकै ।

बियांई है सुन्दरता
जैनै समझने बी
आपनै स्वयं
आत्मा सूं ई सुन्दर होणो पड़ै
या चमडी की आँख्या कोनीं
जिणै देखण
अन्तरमन की ई आँख्या खोलणी पड़ै ।

सौन्दर्य बोलनै कै साथै सचेत होनो
सुगन्धककै लिए साधनारत रेवणियां
थे-म्हे
संसार नै नरक सूं उठावण नैं
अन्तरमन सूं ई
बोल कद मांकर उठसी ?
आत्मा की सुगन्ध सूं
या माटी ककद रोंधी ज्यासी ?

बोलो !
कद आलिंगनबद्ध होवांगा
इणकै स्पर्श सूं ?
अन्तस्करण सूं चायां
के यो इबार ई सम्भव कोनीं ?


कवि चौधरी री ६ कविता संग्रह और २ निबंध संग्रह प्रकाशित हौ गी है । बाकी लार्ली कविता संग्रह ‘वसन्त’ ९ भाषा में प्रकाशित हुई है । आ मारवाडी कविता ‘वसन्त’ कऽ मारवाडी भाषा कऽ संकलन सऽ लईरी हऽ ।)
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