• २०७९ असोज १८ मङ्गलबार

नदी

नन्दा पाण्डेय

नन्दा पाण्डेय

नहीं बनना मुझे सीप या मोती
बनी रहने दो मुझे नदी की तरह…
चाहती हूँ बनी रहूँ
नदी की तरह ही खामोश और
धैर्यवान…….

अपनी ही नदी में
मैं उसका किनारा होना
चाहती हूँ…..
चाहती हूँ बहती रहूँ
उसके अमंद–प्रवाह में……..
सूखे में भी नहीं छोड़ना चाहती
उसका साथ…….

नदी की तरह ही
अपनी शर्म…
अपना पानी… नहीं छोड़ना मुझे
चाहती हूँ….. चुपचाप शांत बहती
रहूँ…….और

मेरा पानी सागर से मिलने की
कहानी कहता रहे……….
ये धरती…….
ये अम्बर……….
हमारे उस मिलन की साक्षी बने……

मैं घुल जाना चाहती हूँ
समूची सागर में
जानती हूँ
बरसों की बाढ़ में बहाकर
सागर ठहरेगा नहीं………और
मैं बहती जाउंगी संग उसके
गहरे–अंतलात में…..गिरने और मिट
जाने के लिए…….!!
…………………………………….
मोरहाबादी रांची, झारखंड, भारत
(स्वतंत्र लेखन, एक कविता संग्रह प्रकाशित)

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