• २०७९ असोज १६ आइतबार

सपनो में सोरि पाड़ैए गाम

विद्यानन्द बेदर्दी

विद्यानन्द बेदर्दी

हकन हुकरैत अङ्गना–दलान
फूलबारि,मचान,खेत–खरिहान
पोखरि–नदी कि डिहबार थान
पवनक वेगसँ लऽ लकऽ नाम हमर
सपनोमे सोरि पाड़ैए गाम हमर ।।

जाति–धरमक छै जोड़ल कड़ी जतऽ
जपैए जन–मन सिनेहक जरी जतऽ
ई सँसारक छै सबटा हरियरी जतऽ
कोयलीया गबैए गीत मधुरी जतऽ
ढेनमाक दुआरमे,गाछक छहारिमे,
बाबूक दुलारमे,आँचरमे महतारिके,
जीवनके जतऽ भेटैए आराम हमर
डोमकछ,जटाजटिन,झिझिया
जुड़शीतल,चौरचन,जितिया
ईद,मोहरम,छठि,दीयाबाती
फगूवाँ,किर्तन,सोहर,पराती
नटुवाँ,नाँच कि हुक्कापाती
भरिजगमे पाएब नइ अष्टजाम हमर ।।

धन्य छै ओ धरती जतऽ भेटल भगिया
पाहुन रामके सेहो देबऽकऽ मिठ्ठ गरिया
जेकर जल चुमै जगमे पहिल किरिणिया
सुनै खिस्सा नेना–भूटका, दादीके गातीमे
सब साल फूलै कुश्मा,सलहेसक छातीमे
पूजाई शिवसिंह–लखमा,ई प्रेमक माटीमे
जइ भूमीके बढौने छै अस्मिता,
विद्यापति,लोरीक,जनक,सिता,
सलहेस,दीनाभद्री,कृष्णाराम हमर
जेकर कोरामे लेलौँ गुड़कुनिया,
जेकर आङुर धऽ देलौँ ठेहुनिया,
जेकर घोघसँ देखलौँ ई दुनिया,
ओइ माटिके सतसत सलाम हमर ।।

कनैछै व्यग्र ई नयन,तितैछै नित सिरहन
सुनि हम त गामके अन्हरियाक आक्रण
उठेबालए चहुँओर जोरशोर नवजागरण
मीता! जाएब हम त चट्टे,
सजाएब जेना होए स्वर्गे,
मातृभूमीक चरणमे चारोधाम हमर
उपजाएब चिरौतोमे मिठास,
जा रहए हमर सिनामे साँस,
करब मिथिलेमे हम त बास,
जँ मिथिले नइ त, कि काम हमर ?

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सप्तरी, राजविराज

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