• २०८० चैत ३० शुक्रबार

मैं एक लड़की हूँ

वियोगिनी ठाकुर

वियोगिनी ठाकुर

एक जवान औरत भी
ऐसी औरत जिसके लिए
ग़लतियों की कोई गुंजाइश नहीं होती
जिसे अपने ऊपर लगाए गए
प्रत्येक लांछन को सिर- माथे पर बिठाना चाहिए
प्रतिउत्तर में रहना चाहिए चुप
या मुस्कुरा देना चाहिए
या फिर आँसू भी बहाए जा सकते हैं- चुपचाप
पर अफ़सोस बार–बार अफ़सोस
यह मुझसे हो न सका कभी
जब- जब यह हुआ
पुरानी सारी पीड़ाएँ उभर आईं पीठ पर

पेट में एक गहरा सुराख है
जिसमें हाथ डालकर कोई बेरहमी से मांस नोचता है
और बाहर फेंकता है
सारा शरीर कीड़ों से भर गया है
जÞमीन पर कितना मवाद बह गया है
या बह गया है-
बचा- खुचा आत्मसम्मान
सुनाई देती है मौत की आवाज़
उफ़ कितनी बेरहम और डरावनी–सी
ख़याल आता है:
क्या अपनी आख़िरी साँसें गिननी शुरू कर दूँ-
दस- नौ- आठ- सात- छह- पाँच- चार- तीन- दो- एक‘
यही तो किया था न उसने
और काट दिया था फ़ोन
एक पुराना प्रेमी याद आता है
साँसों की लय छूटती है
मैं सूखे होंठों पर जीभ फिराती हूँ
और पुकारती हूँ
अपने आख़िरी  प्रेमी का नाम
आख़िरी बार
सोचती हूँ यह भी
कि मेरी मौत पर बारिश तो होगी न
बारिश कितनी‘ कितनी पसंद रही है मुझे
सोचती हूँ यह भी
कि जानती थी
इस बार बचूँगी नहीं।


वियोगिनी ठाकुर, बदायूं उत्तर प्रदेश