• २०८१ श्रावाण ३ बिहीबार

बुद्ध

परिणीता सिन्हा

परिणीता सिन्हा

आसान नहीं है, बुद्ध बन पाना ।
आसान नहीं है, बुद्ध हो जाना ।
बुद्ध, जिस में थी परम बुद्धिमत्ता ।
बुद्ध, जिनकी असीमित थी क्षमता ।
बुद्ध में नहीं थी, सामान्य भौतिकता ।
बुद्ध का मन, गृहस्थी में नहीं था रमता ।
सामान्य जिम्मेवारियों का नहीं कर पाए,निर्वहन ।
उन्हे छू भी नहीं पाया, संसारिक व्यसन ।

यशोधरा के भींगे नयन, सदैव करते रहे प्रश्न ।
राहुल के नन्हे हाथ, खोजते रहे पिता का साथ ।
वो जो बन गये महात्मा,
जिनके अंदर बसी थी दिव्यात्मा ।
अपने पीछे छोड़ गये एक मौन,
उनके अधूरेपन का जिम्मेवार आखिर कौन ?
संसार को मिला, बुद्ध से ज्ञान ।
संसार में बुद्ध सा नहीं होगा, कोई महान ।
देने को नश्वरता का ज्ञान, उन्होने ठाना महाप्रयाण ।
क्या उन्हे नहीं था, यशोधरा की पीड़ा का भान ।
कर्मफल के होते, कई प्रभाव ।

कर्मफल के भी होते ,कई दुष्प्रभाव ।
कभी–कभी बनने को समंदर,
विष समेटना होता है, अपने अंदर ।


परिणीता सिन्हा
गुरुग्राम, हरियाणा, भारत