• २०८१ असार १ शुक्रबार

हिन्दी कविता

दया भट्ट दया

दया भट्ट दया

प्रेम अनादि है, प्रेम अनंत है ।
प्रेम एक ऐसी अवधारना है..
जो सीमाओं को तोड़ना नहीं,
वरन् सीमाओं में बाँधना और
सीमाओं में रहना सिखाता है ।

आपके अंदर अगर प्रेम मर चुका है…
तो उसे फिर से जीवित करो, सिंचित करो, पल्लवित करो ।
आगाज बसंत का है, प्रकृति के पुनरुत्थान का है ।
यह धरा पर नए कोपलों के उगने का समय है ।
अपने अंदर भी प्रेम को सिंचित करो,
और प्रकृति के साथ हो लो ।

जीवन में नव रंग भरो, नई उमंग भरो, उत्साह भरो ।
प्रेम को बाहर मत ढूंढो, प्रेम अपने अंदर जगाओ ।
जीवो पर दया करो, करुणा करो ।
मानवता से प्रेम करो, चिरसंचित करो ।
अनादि तक करो, अनंत तक करो ।


दया भट्ट दया
खतिमा, उत्तराखंड, भारत