• २०८१ श्रावाण १ मङ्गलबार

मैं और चाँद

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

फिर वही
अंधेरे की चादर ओढे
घरों में सेंध लगाती,
सूनी रात
फिर वही,
नई पुरानी यादों की परछाईयां
फिर वही दूर खिडकी के उस पार
कटी पतंग जैसा
हवा में तैरता चाँद
फिर वही तन्हाईयों में घिरा मैं !

हमेशा की तरह चुपचाप
खिडकी के पास
कुर्सी पर बैठा मैं
चाँद को देख रहा हूँ
दिल ही दिल में सोच रहा हूँ
मुझ में और चाँद में कुछ तो ऐसा है
जो एक जैसा है
वो भी तन्हा, मैं भी तन्हा
न जाने कितनी सदियों से
चाँद आकाश पर
और मैं जमीन के पथरीले रास्तों में
ढूँढ रहे हैं दोनो
अपनी–अपनी मंजिल !

साभार: चाहतों के साये मेंं


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(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)