• २०८० मंसिर १५ शुक्रबार

पिता

स्वाति श्वेता

स्वाति श्वेता

जीवन की कड़ी धूप में
बादल का घना टुकड़ा बन
हर बार बरस कर
जलने से बचाया
वक्त की चोट से
जब जब हिले कब्जे
दर्द को दबा
आँसू को छिपा
गमों की भीड़ में
हँसना सिखाया
जब भी शब्दों ने
उतारे अपने रोगन
खाली शब्दों को
अपने रंग में रंगना सिखाया
यादों की गीली मिट्टी में
अपनेपन के बीजों को
हर मौसम में बोना सिखाया
उन खामोश नज़रो ने
बहुत कुछ दिखाया…


स्वाति श्वेता, नई दिल्ली, भारत