• २०७९ मंसिर २१ बुधबार

प्रेम

बसन्त चौधरी

बसन्त चौधरी

अगर प्रेम न होता,
तुम, तुम न होतीं, मैं, मैं न होता !
न तुम हँसती, न मैं हँसता !
न तुम रोतीं, न मैं रोता !
हमारे जिंदा रहने का आकर्षण है प्रेम !
जिंदगी जीने का मकसद है प्रेम !

सिर्फ प्रेम ही है वह चीज जो प्रेम करना सिखाता है
प्रेम, दिल से दिल तक की यात्रा करता है
आत्मा से आत्मा तक प्राण भरता है ।

प्रेम गहरा होता है और प्रेमी उसी गहराई में
जीवन का उत्कर्ष पाता है !

उसी प्रेम की कसम,
मैं तुम्हें प्रेम के उसी यथार्थ में
अंकमाल करना चाहता हूँ,
अनुभूति की उसी भूलभूलैया में
तुम्हारे साथ खो जाना चाहता हूँ !

प्रिये ! मैं क्यों कहूँ कि विश्वास करो ?
प्रेम है ही तो क्यों हुआ जाए विश्वास पर आधारित ?

दौलत के पुजारी भला क्या समझें प्रेम का लाभ, प्रेम की हानि !
क्या समझें और कैसे समझें वो प्रेम का गणित ?

प्रेम ही है वह बगीचा
जहाँ शून्य भी खिलता है अंक होकर अगणित,
प्रेम के स्तंभ पर घुमता है संसार
निराकर के सहारे ही तो है टिका हुआ आकार !

साभार: चाहतों के साये मेंं


[email protected]
(चौधरी विशिष्ट साहित्यकार हैं ।)