• २०८१ श्रावाण १ मङ्गलबार

मुझे कौन बाँटेगा

आनन्द वर्धन शर्मा

आनन्द वर्धन शर्मा

पतिदेव के गुजरे हुए कुछ ही दिन व्यतीत हुए थे । तेरहवीं का संस्कार भी सम्पन्न नहीं हुआ था । वृद्धा माँ अपने पुत्रों व अन्य परिजनों से घिरी हुई बँटवारे का दृश्य देख रही थी ।
‘मैं पिता जी की दुकान लूँगा ।’ बडे भाई ने अपने बडे होने का हक जताया ।
‘तो फिर यह मकान मेरा होगा ।’ मँझले भाई का स्वर उभरा ।

‘ठीक है । बडे भैया की दुकान तथा मँझले का मकान है तो आज से खेती की जमीन और बैंक खाते पर मेरा कब्जा होगा ।’ छोटे ने अपनी व्यवस्था दी ।
‘माँ पिता जी तो नहीं रहे । अब इन जेवरों का क्या करोगी ? इन्हें अपनी बहु बेटियों में बाँट देना ।’ बडी बेटी ने परामर्श दिया ।

‘मेरे बच्चों तुमने अपने पिता की सारी सम्पत्ति को बाँट लिया किन्तु तुम भूल गए कि मैं भी ती उनकी सम्पत्ति हूँ । मुझे कौन बाँटेगा, मैं किसके हिस्से में आउँगी ? कौन मेरी सेवा की जिम्मेदारी लेगा ?’ यह कहते हुए असहाय वृद्धा का कमजोर शरीर काँपने लगा ।
सबने गौर से देखा । माँ की गीली आँखें उसकी धोती का पल्लू भिगो चुकी थी ।


आनन्द वर्धन शर्मा
(नौगाँव,अल्मोडा, उत्तराखंड, भारत)