• २०८१ बैशाख ८ शनिवार

कच्ची मिट्टी

कुमुद शर्मा 'काशवी'

कुमुद शर्मा 'काशवी'

कच्ची मिट्टीसी मैं,
सबके रंगमें रंग जाऊँ,
ढाल ख़ुदको…!
अपनोकी ख़ुशियों में,
मन ही मन सुकून पाऊँ,
हर रिश्तेके साँचेमें,
ढाल ख़ुदको…!
सबके मनका करती जाऊँ,
ऐसा कर मैं हर रिश्तेको,
पक्का करती जाऊँ,
ख़ुदका जीवन न्योछावर कर,
किसी ओर के नाम से ही…,
मैं पहचानी जाऊँ,
कभी किसीकी बिटिया,
कभी गृहलक्ष्मी…कहलाऊँ,
कभी माँ बन बच्चोंमें,
अपना अस्तित्व…,
ढूँढ़ती जाऊँ,
इस घरको अपना,
और बाबुलका आँगन,
पराया करती जाऊँ,
मैं रमणी कैसे…!
सुनो सबकी…,
करो अपने मनकी,
मैं समझ पाऊँ,
जब कफ़न भी अपना,
मैं अपने मायके से पाऊँ,

साभार: साहित्य रचना इ-पत्रिका


गुवाहाटी, असम, भारत