• २०८१ बैशाख ८ शनिवार

शाश्वत प्रेम

राजकुमार जैन

राजकुमार जैन

वक्त के भास्कर की
उज्ज्वल किरणों को
ओढकर दबे पांव
खिडकी से आती स्वप्निल
हवामें
तुम्हारे सारे प्रेम-पत्र
फड्फडा रहे हैं
जो लिखे थे तुमने मुझे
प्रेम में
उनमें सुनाई दे रही है
तुम्हारे हृदयकी धडकने
और दिल महक रहा है
गुलाब के फूलोंकी खुशबूसा

जी करता है
ये सारे प्रेम-पत्र
फ्रेम में जडा. कर
दीवार पर टांग दूँ
ताकि आने वाली पीढियाँ
जान सके कि
प्रेम क्या होता है ?

जब सब कुछ छूट जाएगा
और साथ छोड रही होगी
स्मृतियां भी
तब फ्रेमकिये ये प्रेम-पत्र
अपने अपनत्व से
अंगुली थामें साथ-साथ
बतियाते चलेंगे
मेरी आखिरी साँस तक

प्रेमकी कोई अवधि
नहीं होती
मेरे बाद इस शाश्वत प्रेम को
यादों के गलियारे में
अपनी अनुभूतिकी वर्णमाला से
खोजते रहेंगे
इस कलियुग के प्रेमी ।


राजकुमार जैन राजन, चित्रा प्रकाशन. राजस्थान
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