• २०८१ बैशाख ८ शनिवार

गुलमोहरी सपनोंकी दास्ताँ

बिशन सागर

बिशन सागर

याद है न तुम्हें
तुम्हारे बीस साल पहले के
लिखे वो खत
आजभी पडे हैं मेरे पास
सुरक्षित ।
पीले पड चुके पन्नों में
झांक रहा है तुम्हारा
दमकता हुआ चेहरा
जीवन से भरी तुम्हारी आँखें
तुम्हारी उन्मुक्त हँसी
तुम्हारे बदनकी महक ।

वक्त जरा सा भीनहीं
दिखापाया इन पर
अपना असर ।
बिल्कुल मद्धिम नहीं पडे हैं
इन पर लिखे अक्षर ।
पर
तुम्हारी लिखती हुई उंगलियों की
मूक ध्वनियाँ
जाने कहाँ खो गई हैं
यादों के बीहड में ।

पन्नों पर उतर आई तुम्हारी
साँसों की गर्माहट
शब्दों की गहराई
भर जाती है मुझ में
आज भी
वो पहले सा खुमार ।

देखो न
फिर से होने लगा है
तुम्हारी निकटता का अहसास
वही कनेर के फूलोंकी गंध
गुलमोहरी सपनों की दास्ताँ
साथ बिताए वो बसंत
फिर से लेने लगे हैं
अंगड़ाई ।

सुनो न
यह मेरी कल्पना नहीं है
लग रहा है सच
तुम निकल रही हो
खतों से बाहर ।
तुमने अचानक भींच लिया है
मुझे पीछे से आकर जैसे
बीस साल पहले किया करती थी
और फिर हम दोनों
डूब जाया करते थे प्यार के सागर में
सारी दुनिया से बेखबर ।

कभी नहीं भूल पाऊँगा
तेरी ये मेहरबानियाँ ।
मैं जन्मों तक रखूँगा तुम्हें अपने
दिल के आईने में संभाल कर ।
मैं सदियों तक करता रहूँगा
तुझसे प्यार ।


बिशन सागर, जालन्धर, पञ्जाव, भारत
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