• २०७९ असोज १६ आइतबार

ये नशा

उदय निरौला

उदय निरौला

ये अखियाँ
क्यों पीती हैं
शराब ?
न तो है
यह नशा खराब
और न ही
यह आदत खराब
बेमौसम क्यों
धड़के यह दिल
और अखियाँ बारबार
ढूंढे शराब ।

क्या है यह नशा
न जाने दिल
न जाने मुसाफिर
राहें बदल-बदलकर
बारबार यह अखियाँ पीती हैं शराब
हुस्न दूर है
मोहब्बत दूर है
चक्कर है क्या
लोग देखते-देखते छूट जाते हैं
काँटे पड़े है
रेगिस्तानी सफर में
दूरियाँ बढ़ रही हैं
मौसम है इश्क का
मगर अखियाँ
बारबार करती हैं नशा
बारबार भीग जाती हैं कहां
न जाने महशय !
यह आदतें भी नहीं
मगर पीती रहीं हैं यह अखियाँ
काली शराब ।


(निरौला स्थापित नेपाली कवि हैं)
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