• २०७९ असोज १९ बुधबार

न ये इश्क़ होता न बर्बाद होते

सरिता पन्थी

सरिता पन्थी

तेरे साथ रहकर भी तन्हा बसर की
किसे क्या बतायें ये बातें है घर की

कटी ज़िन्दगी कैसे अब तक हमारी
न उसने ही पूछा न हमने ख़बर की

न ये इश्क़ होता न बर्बाद होते
हुई इसमें सारी है गल्ती नज़र की

जिन्हें बात झूठी दिखानी है सच्ची
कसम खा रहे हैं वो बच्चों के सर की

न तुम सुन सकोगे जो हमने गुज़ारी
सुनाएं कहानी क्या अपने सफ़र की

वो ख़ामोश रहने लगा है न, जबसे
इधर की खबर है न कोई उधर की

तेरे नाम पर ज़िन्दगी मर रहे हैं
ज़रुरत नही अब किसी भी ज़हर की


(सरिता पन्थी, महेन्द्रनगर, सुदुर पश्चिम नेपाल)
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