• २०७९ असोज १९ बुधबार

ग़रीब रिश्तेदार

विनय सौरभ

विनय सौरभ

ग़रीब रिश्तेदारों के ताज़ा हाल हमारे पास नहीं होते
उनका ज़िक्र हमारी बातचीत में नहीं आता
हम हमेशा ज़ल्दी में होते हैं
और हमारी गाड़ियां उनके दरवाज़े से सीधी गुजर जाती हैं

एक दिन फ़ोन आता है मौसेरे भाई का
पता चलता है कि मौसी गुजर गई
साल भर से बीमार चल रही थी
वह कहता है- दुमका में सभी डॉक्टरों को दिखाया
और सरकारी अस्पतालों का हाल तो आप जानते ही हो भैया
वह बिना पूछे ही बोले जा रहा है
अगले गुरुवार को श्राद्ध कर्म हैआ जाना भैया !

एक दिन वह लेकर चले आते हैं विवाह का आमंत्रण कार्ड
तब हमें पता चलता है कि जिस लड़के को देखे ग्यारह साल हो गए थे
अगले माह की सात तारीख़ को
उसका ही विवाह है
वे बड़े भोलेपन से कहते हैं-
कमाने लगा है अपना परिवार अब संभाल लेगा

एक दोस्त को जानता हूँ
वह अपने शहर के सब्जी बाज़ार नहीं जाता
उसके बड़े भाई का साला
सब्जी बेचता दिख जाता है
उसे लाज बहुत आती है

अशोक राजपथ से किताबें खरीदकर स्टेशन लौटते हुएदिखे दूर के एक रिश्तेदार
मामा यहाँ, पटना में कैसेपूछता हूँ
बदहवासी में वह कह रहे थे:
ऑटो पलट गया था
पैर टूट गया है बेटे का
पीएमसीएच में भर्ती है
अच्छा है तुम मिल गए बेटा !
मैं यहाँ किसी को नहीं जानता
अच्छा हुआ तुम मिल गये !

मामामैं भी किसी को नहीं जानता पटना में
हमारा रेल में रिजर्वेशन हैनहीं तो देखने आता
भगवान पर भरोसा रखिएसब ठीक हो जाएगा
कहता हुआ पिंड छुड़ाता निकल लेता हूँ वहाँ से

हम उनके किसी दुख में शामिल नहीं होना चाहते
उनकी पीड़ा से हमारा दिल ज़्यादा पसीजता नहीं
हमें लगता है कि वह हमसे पैसे मांगेंगे
बेकार ही वक़्त जाया करेंगे हमारा
हमारी संवेदना में कोई पत्ता उनके लिए बस कुछ ही देर के लिए हिल पाता है

गरीब रिश्तेदारों के यहाँ जाओ तो
अपने आँचल से पोंछकर कुर्सी या मोढ़ा आगे करती है एक स्त्री
और पूछती है पूरे घर का हाल
खूब सारा दूध की मीठी हो गयी चाय आगे करती है
और पूरा घर उत्सुकता से चेहरा तकता रहता है हमारा

वे कहते हैं कभी- कभार आ जाया करो
अब कहने को अपने लोग बचे ही कितने हैं !
यह खीरा और भिंडी लेते जाओ
अपनी ही बाड़ी के हैं
इस बार आम बहुत आए हैं
पकने पर हम लेकर आएंगे माँ को बोल देना
वापसी में एक झोला तरकारियों से भरा हमें पकड़ाते हुए वे कितने विह्वल दिखते हैं

बिजली के तार झूलते रहते हैं
गरीब रिश्तेदारों के कच्चे- पक्के घरों में
उनके बच्चों की हमें ख़बर नहीं होती
वे कब के चले गए हैं दिल्ली पंजाब कमाने
उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं
सरकार के मध्यान भोजन के साथ

वे दलालों से मिलते हैं और घिघियाते रहते हैं
वृद्धा पेंशन और आवास योजना के लिए !

वह हमारा ज़िक्र करते हैं बहुत उत्साह से
कि हमारा बड़ा मकान है शहर में
और हम सब सरकारी नौकरियों में हैं

और हमारे मोबाइल फ़ोन में
उनका नंबर तक नहीं होता !


(एक संवेदनशील कवि अनेक स्थापित पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित नोनीहाट झारखंड, भारत)
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