• २०७९ असोज १८ मङ्गलबार

वर्तमान समय और साहित्य की प्रासंगिकता

डॉ. श्वेता दीप्ति

डॉ. श्वेता दीप्ति

आज का समय बहुत ही निर्मम है । मृत्यु जैसे शब्द आम बनते जा रहे हैं । हम रोज लाशों की गिनती कर रहे हैं । महामारी का ये दौर किस तरह और कैसे जाएगा बेबस और लाचार होकर हम इंतजार कर रहे हैं । ऐसे हताशा के समय में वर्चुअल मुलाकात और बातचीत बहुत ही मायने रख रहे हैं । हम विभिन्न विषयों पर बातें कर रहे हैं और खुद को एक उम्मीद की किरण से जोड़ रहे हैं । हम जुड़ रहे हैं मानसिक तनाव के बीच और खुद के साथ ही अन्य को भी तुष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं । सामाजिक दूरी के नारा के साथ ही हम मानसिक स्तर पर जुड़ रहे हैं जो एक अलग इतिहास जरूर रचेगा । आज के कोरोना समय में जब अधिकांश लेखक बिरादरी आनलाइन है तो दुनिया में विभिन्न भाषाओं में कवि कथाकार सोशल मीडिया के जरिए खुद को अभिव्यक्त कर रहे हैं । हम अपनी बातें शब्दों में गूँथकर व्यक्त कर रहे हैं । जो आज हर दिल दिमाग की बातें हैं वही कह रहे हैं
साहित्य वही उकेरता है जो हमारा वक्त कहता है । महामारी का दौर पहले भी आया है और साहित्य में स्थान पाता रहा है । कह सकते हैं कि साहित्य सुख और दुख दोनों को व्यक्त करता आया है । जब अचानक हमें चारदिवारी में कैद कर दिया गया तो हमारे अन्दर एक सन्नाटा व्याप्त हो गया था जो मेरी निम्न पंक्तियों में भी व्यक्त होता चला गया —
आजकल सन्नाटा बोलता है
घर की खामोश दीवारों पर
डोलती तनहाई
जकड़ लेती है खामोश शब्दों को, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
छिपकली की आवाज
भी आज गहरी लगती है,
दीवार पर टँगी
घड़ी की टिकटिक
रात के साए को
और भी गहरा करती है, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
खो गई थी जो चैत के महीने में
कोयल की कूक
चिडि़यों की चहचहाहट
सूरज की पहली किरण के साथ
कानों में घोलती है शहद, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
घर के आँगन में खड़ा
इकलौता आम्रपाली का पेड़
सज गया है मंजरों से
धूल, पेट्रोल की गंध में
खोई उसकी खुशबु
आज पहचानी सी लगी, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
कल हुई बारिश की बूँदों ने
जब भिगोया था धरती को
तब मिट्टी की सोंधी खुशबू को
महसूस किया था मन ने, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
भरी दोपहरी
पेड़ों की टहनियों पर
हवा का झूमना और
पत्तियों की सरसराहट
के बीच पक्षियों के बसेरे में
होती कलरव भाता है मन को, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
आज नहीं है सड़कों पर
एम्बुलेन्स की डराती आवाज
गाडि़यों के हा‘र्न और भागती जिन्दगी
कंकरीट के जंगल में
लौट आया है अपना गाँव, क्योंकि
आजकल सन्नाटा बोलता है ।
अतीत को खंगालें तो यह सहज ही ज्ञात होता है कि वैश्विक महामारियां अपने समय और भविष्य को प्रभावित करती आई हैं । राजनीति और भूगोल के साथ समाज और साहित्य भी इससे अछूता नहीं रहा है । दुनिया जब किसी विपदा में घिरी है तो सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में भी उनका असर हुआ है. जानलेवा संक्रमण का यह विनाशक कोरोना काल पीढ़ी दर पीढ़ी याद किया जाएगा । इस हकीकत को साहित्यिक रचनाधर्मिता से जुड़े लोगों ने भी बेहद करीब से पढ़ा सुना देखा है । उन्होंने लाकडाउन की अनिवार्यता और उससे उपजी प्रतिकूल परिस्थितियों की पीड़ा पर तीव्र मंथन किया है । स्वाभाविक तौर पर विनाशक कोरोना काल में मंथन से निकली सृजन की सुधा समाज के साहित्य प्रेमी तबके को तृप्ति दे रही है । सच तो यह कि लॉकडाउन से फूटी साहित्यिक सुधा में वामपंथ, दक्षिणपंथ और मध्यमार्ग तीनों ही विचारों की खुशबू है । जो रचनाकार जिस विचारधारा से हैं, उसी के अनुरूप रचनाएं कर रहे हैं । हां, रचनाओं में आमलोगों का दर्द, व्यवस्था की विवशता, सरकार के खिलाफ आक्रोश ये सभी पक्ष समाहित हैं ।

आज के कोरोना समय में जब अधिकांश लेखक बिरादरी आनलाइन है तो दुनिया में विभिन्न भाषाओं में कवि कथाकार सोशल मीडिया के जरिए खुद को अभिव्यक्त कर रहे हैं ।

महामारियों के कथानक पर केंद्रित अतीत की साहित्यिक रचनाएं आज के संकटों की भी शिनाख्त करती हैं । ये हमें मनुष्य जिजीविषा की याद दिलाने के साथ साथ नैतिक मूल्यों के ह्रास और मनुष्य अहंकार, अन्याय और नश्वरता से भी आगाह करती हैं. इतिहास गवाह है कि अपने अपने समयों में चाहे कला हो या साहित्य, संगीत, सिनेमा तमाम रचनाओं ने महामारियों की भयावहताओं को चित्रित करने के अलावा अपने समय की विसंगतियों, गड़बडि़यों और सामाजिक द्वंद्वों को भी रेखांकित किया है. ये रचनाएं सांत्वना, धैर्य और साहस का स्रोत भी बनी हैं, दुखों और सरोकारों को साझा करने वाला एक जरिया और अपने समय का मानवीय दस्तावेज है ।
अज्ञेय ने कहा था, “यदि मैं यह मानता होता कि साहित्य का और यहाँ साहित्य से मेरा आशय रचना अथवा कृति साहित्य का ही है—सामाजिक परिवर्तन में कोई योग नहीं होता, अथवा साहित्यकार का समाज के प्रति कोई ऐसा उत्तरदायित्व नहीं है जिसमें यह भी निहित हो कि समाज को बदलने का कुछ यत्न भी उससे अपेक्षित है, तो शिविर में विचार के लिए इस विषय का प्रस्ताव मैंने न किया होता । इतना तो स्वयंसिद्ध जान पड़ सकता है, लेकिन इससे आगे यह भी कहूँ कि उस दशा में मैंने अपने साहित्यिक कर्म के बारे में भी नए सिरे से विचार किया होता क्योंकि आज अपने को साहित्यकार का नाम देकर मैं जिस तरह के गौरव का अनुभव करता हूँ उसका कोई आधार न रहा होता । तब साहित्य कर्म भी दूसरे पेशेवर कर्मों अथवा व्यवसायों की तरह आजीविका का एक साधन मात्र होता और ऐसा सोचने का कोई आधार न रहता कि साहित्यकार होने के नाते अपने समाज के साथ मेरा एक विशेष प्रकार का सम्बन्ध है—समाज से मेरा आशय चाहे हिन्दीभाषी समाज हो जो मेरा पहला पाठक होगा, चाहे भारतीय समाज जिसके दिक्काल संचित अनुभव को मैं वाणी दे रहा हूँगा, चाहे मानव समाज हो जो शब्द मात्र में अभिव्यक्त होनेवाले मूल्यों की अन्तिम कसौटी है—बल्कि जो उनका स्रोत भी है ।”( साहित्य, संस्कृति और समाज परिवर्तन की प्रक्रिया, अज्ञेय संपादन — कन्हैयालाल नंदन)
साहित्य की परिभाषा करते हुए कहा गया है ‘हितेन सहितं’ अर्थात् जो हित साधन करता है, वह साहित्य है । साहित्य उस रचना को कहते हैं जो लोकमंगल का विधान करती है । मुंशी प्रेमचन्द के अनुसार साहित्य जीवन की आलोचना है । इस सूक्ति से यह स्पष्ट है कि साहित्य का जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है ।
साहित्य में जीवन की अभिव्यक्ति किसी न किसी रूप में अवश्य होती है, वह नितान्त जीवन निरपेक्ष नहीं हो सकता, इतना अवश्य है कि उसका कुछ अंश यथार्थ होता है, तो कुछ काल्पनिक होता है । भारतीय चिन्तक एवं कवि साहित्य के उपयोगितावादी दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं । कविवर मैथिली शरण गुप्त के अनुसार—
“मानते हैं जो कला को बस कला के अर्थ ही ।
स्वाधीन करते कला की व्यर्थ ही ।”
कला केवल सौन्दर्य का ही विधान नहीं करती अपितु वह सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् से युक्त होकर लोकमंगल का विधान भी करती है । कला हमारी मार्गदर्शिका है, साहित्य हमारा प्रेरक है और संस्कृति हमारी पहचान हैं । इसी की अभिव्यक्ति निम्न पंक्तियों में हुई है—
“किन्तु होना चाहिए क्या कुछ कहाँ
बया करती है इसी को कला”
किसी देश, जाति समाज की पहचान उसके साहित्य से होती है । साहित्य हमारी संस्कृति की जलती हुई मशाल है और वही हमारे राष्ट्रीय गौरव एवं गर्व की वस्तु है । भारत की वास्तविक पहचान वे हिन्दी साहित्य के कालजयी कवि और लेखक हैं जिनकी रचनाएँ हमारा सम्बल हैं । तुलसी, कबीर, प्रसाद, पन्त, निराला, रवीन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचन्द, शरतचन्द्र, दिनकर सुब्रमण्यम भारती, विमल राय, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, कालिदास, बाणभट्ट,जैसे साहित्यकारों से ही भारत की आत्मा को पहचाना जाता है । इनकी कालजयी कृतियों ने विश्व साहित्य में भारत का गौरव बढ़ाया है ।
साहित्य व्यक्ति का संस्कार करता है । उसके भीतर छिपे देवता को जगाता है तथा पाशविकता का शमन करता है । तुलसीदास जी ने स्वीकार किया है कि कविता लोकमंगल का विधान करती है तथा वह गंगा के समान सबका हित करने वाली होती है ।
“कीरति भनिति भूति भल साई । सुरसरि सम सब वह हित होई ।”
साहित्य और समाज का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है । समाज का पूरा प्रतिबिम्ब हमें तत्कालीन साहित्य में दिखाई पड़ता है । समाज में व्याप्त आशा–निराशा, सुख–दुख, उत्साह हताशा, जैसे भाव साहित्य को प्रभावित करते है तथा इन्हीं से साहित्य के स्वरूप का निर्धारण होता है । समाज में यदि निराशा व्याप्त है तो साहित्य में भी निराशा झलकती है । साहित्य समाज का दर्पण है दर्पण में वही प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है जो उसके सामने रख दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार साहित्य में तत्कालीन समाज का ही चित्रण होता है ।
आज पूरा विश्व वैश्विक महामारी से गुजर रहा है और यह पीड़ा वर्तमान समय में रचित रचनाओं में दिख रही है जो स्वाभाविक है । ऐसे ही समय समय पर जब भी सृष्टि पर कोई आपदा आई है तो वह साहित्य में भी जगह पाती रही है । प्रसाद रचित ‘कामायनी’ की शुरुआत ही प्राकृतिक विपदा से उत्पन्न हुए प्रभावों से होती है । इतना ही नहीं आपने हिन्दी साहित्य की इस महान कृति में मनु और श्रद्धा के माध्यम से निराशा में आशा और जीवन के प्रति उत्तरदायित्व का वर्णन वहन करने की सीख दी है । मनुष्य जब चिंताग्रस्त होता है तो वो निराशा के गर्त में डूबा होता है–
“हे अभाव की चपल बालिके, री ललाट की खल रेखा,
हरी–भरी–सी दौड़–धूप, ओ जल–माया की चल रेखा ।
अरी व्याधि की सूत्र–धारिणी, री आधि मधुमय अभिशाप,
हृदय गगन में धूमकेतु–सी, पुण्य सृष्टि में सुन्दर पाप ।”
चिंता सर्ग, कामायनी)
निराश मनु को श्रद्धा जीवन से जुड़ने का संदेश देती है और मानवता की विजय कामना के लिए प्रेरित करती है और कर्ममय जीवन का सन्देश देती है । कहने का तात्पर्य यह कि साहित्य की रचना ही मानव को सम्भालने के लिए की जाती है । इसलिए समयानुरुप विषय साहित्य का आधार बनते हैं । साहित्य के लिए हर साहित्यकार कथावस्तु को समाज से ही उठा लेता है । शायद इसीलिए प्रेमचंद ने ‘साहित्य को समाज के आगे.आगे चलने वाली मशाल’ कहा है ।
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(डा. श्वेता दीप्ति त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य की उप–प्राध्यापक हैँ)

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