पगलो आजी - Aksharang
  • २०७८ जेठ ४ मङ्गलबार

पगलो आजी

डॉ.सुमन सिंह

डॉ.सुमन सिंह

ओह दिने गाँव के प्राथमिक इस्कूल में कवनों बरात रुकल रहल । खूब चहल–पहल रहल । हमहन के घर के समनवे वाला खेत में तम्बू गड़ल रहल अउर बराती लोगन क खूब स्वागत–सत्कार होत रहल । लाउडस्पीकर पर ‘हाँथे में मेहँदी, माँगे सेनुर, बरबाद कजरवा हो गइल हो…।’ बजत रहल । ओहर समियाना में जेतने किसिम क गाना बजे एहर घर में आजी ओतने किसिम क गारी तजबीज के बाबा के आवभगत में लगल रहलीं । हम ओह समय कक्षा तीन में पढ़त रहलीं । न त गाना क महातम समझ में आवे न त गारी क । बस एतना जानत रहलीं कि कवनों न कवनों गारी बाबा के कपारे चढ़ी आ फिर उहो खुनुस में आजी के कुल्ह आकी–बाकी पूरा करे के धमकी देत गोजी लहरावत ,धोती फटकारत भरि–भरि गाल गरिआवत चल दीहन, कब्बो खेत ओरी त कब्बो सीवान ओरी । उनके जाते आजी बुदबुदात–खदबदात दाल–भात रीन्हे लगिहन । बाबा–आजी क कलह अउर सुलह दिनरात देखे क हमहन क आदत रहल बाकिर ओह दिने त अति हो गइल रहे । आजी क गारी रुकहीं क नाम ना लेत रहे अउर बाबा दुआरे बइठल इनके हिकभर सरापत रहलन । हम एह फेर में रहलीं कि एह झगड़ा–झंझट के फेर में बाबा के संगे समियाना में नाच देखे जाए के मिली कि ना । बड़ा जिदीअइले,धूर में लोट–लोट के रोवले त बाबा मानल रहलन बाकिर अब इनहन लोगन के झगरा–झंझट में कुल्ह मेहनत पर पानी पड़ले नियन लगत रहल । नउवा चच्चा हर कार–परोजन क बोलावा दुआरे आके दे जात रहलन । हर बोलावा पर हम कब्बो बाबा के पंजरे दऊड़ के जायीं कब्बो आजी के लग्गे बाकिर एह लोगन में गारी–गरगरहट भईले के बाद अइसन फुल्ला–फुल्ली हो गइल रहल कि ‘हूँ–टूँ’ भी बन हो गइल रहल । सांझी ले केहू–केहू से ना बोललस त हमहीं आजी के मनावे गइलीं—
“ए आजी हो !  बिआह देखे ना चलबू का हो..ताई जी अउर … ?” बड़ा डेरात–डेरात अबहीं कंठ से एतने निकलल रहल कि आजी खुनुसन मारे के दउड़ा लिहलीं ।
‘भगबी कि ना इँहा से ..बियाह देखे जाए के ह इनके…अइलीं ह इँहा नेवता–हँकारी करे । कब्बे ले त एही ताक में लगल हउवे ऊ निस्तनिया कि हम एहर बियाह देखे जायीं आ एके पतुरियन क नाच देखे के मिले, कुल्ह पेट काट–काट के संचल–धइल कमाई लुटावे के मिले । अउर तू जवन बब्बा जी (बब्बा जी’  के मुँह चमकावत–बिरावत अउर हाथ नचावत उचरलीं– के कान्ही पर चढि़ के नाच देखे जाए खातिर बेकल हई न त आवे दे तोरे माई–बाप के …कहीला न कि ..अपने त अपने ई बित्ता भर के लइकियो के नासत ह निस्तनिया ।’ आजी से माई–बाप क नाँव सुनते हमके अइसन कँपकपी छूटल कि चललीं भाग । माई–बाप के कोप से अबहीं तक त इहे लोग बचावत आइल रहल । छोट–बड़ भूल चूक ढांपत–तोपत आइल रहल । माई–बाबू के घरे ना रहले के चलते ही त नाच देखे क सुखद संयोग बनल रहल । इनहन लोगन क रार–तकÞरार देख के त अब हमके तनिको आस ना रहल कि नाच देखे जाए के मिली । दुवार के समनही समियाना भइले प त मोका मिलल रहल नाच देखे जाए क । एसे पहिले लइकी होइले गुने कहीं मेला–हाट,बर–बरात जइहीं के ना मिले । पिताजी एक ले खुनुसाह । कहीं अड़ोस–पड़ोस में भी खेलत धरा जाईं त अइसन डाँटे कि हमार होस–हवास गुम हो जाय ।
आजी क डाँट–फटकार सुन के हम चुपचाप दुआरे भाग आइल रहलीं आ लाउडस्पीकर पर बजत गानन के सुन के मन मनावत रहलीं । नाच देखे जाए क अब कवनों आस ना रहे तब्बो रहि–रहि के काली माई से इहे मनाईं कि हमार आजी माई मान जायँ, की त बाबे खुनुसइले सही बाकिर नाच देखे चल दें । बाबा से पहिले आजिए के बियाह देखे जाए के पड़ल । टोला–मोहल्ला क गोतिनी दयादिन अइलीं आ आजी पहिन–ओढ़ के तइयार होके निकल गइलीं, जाते जात हमरो के नयका फराक अउर चप्पल पहिना के धिरावत गइलीं— देख ! जदि इ बुढ़वा पइसा रोपया लुटाई त हमके बतइहे । ओइसे त कुल बकसा–कोठारी ताला–कुण्डी दे आइल हईं बाकिर हऊ खुद्दीया बनियवा ..महपतरा एकर संगी न हक्, रिन करजा देवे में एक छन ना गंवाई.. हमहीं न जानत हईं कि परसाल क रीन कइसे भराइल रहल…।’ आजी पता ना अउरी का–का बरबरात रहलीं, हमके कुछ ना सुनात रहल ..बस इहे लगे कि केतना जल्दी समियाना में पहुँची आ नाच देखे के मिले । आजी के गइले के बाद बाबा सपÞmेद कड़कड़ धोती कुरता पहिन के तइयार भइलन आ हम उनकर उंगली थमले कुदत–फानत खूब सुन्नर सजल समियाना में पहुंचलीं । जगमग–जगमग करत दूधिया रोशनी में रंग–बिरंगा मंच सजल रहे । ओप्पर सात जनी नाचत रहलीं । गाना क एक लाइन अबहियों ले इयाद ह— सात सहेलियाँ खड़ी–खड़ी,गाना सुनावें घड़ी–घड़ी ।’ कब्बो हम उनकर गाना सुनीं त कब्बो बेसुध होके उनकर बनाव–सिंगार देखीं । एक गाना खÞतम होवे त दोसर शुरू हो जाय अउर जब दुसरका शुरू होवे त कुछ नाचेवाली परदा के पीछे आके सुस्ताएं अउर अपने चेहरा पर कुछ सपÞmेद रंग क लेप लगावं । हमहूँ एकाध बार एह उम्मीद में जायीं कि हमरो मुखमण्डल पर गोर करे वाला पाउडर केहू पोत देत बाकिर केहू हमरे ओरी देखबो न करे सब अपनही सजे–धजे में लगल रहे । कुछ देर त नाच देखे में मन लगल बाकिर तनिके देर में इ देख के मन दुखित होवे लगल कि गाँवे क कुल बाबा–चच्चा लोग नचनियन प खूब जम के पइसा–रूपया लुटावत हउवन । ढेर दुःख इ देख के होत रहल कि हमरो बाबा जे दिन–दिन भर ररले प दस पइसा टाफी खाये के देत रहलन ऊ नाचेवालिन के रुपया प रुपया लुटावत हउवन । ई कुल देख के मारे जलन से हम रोवे–जिदिआए लगलीं कि— घरे चला….चला नाही त आजी के बता देब कि तू केतना–केतना पइसा लुटवला ह ।’ बाबा कुछ देर ले त हमार रोवल गावल बरदास्त कइलन बाकिर जब बिलखल असह्य होवे लगल त दू–चार चटकन जड़ दिहलन । बाबा क दुलरुई रहलीं हम अउर कब्बो अइसन जबर झापड़ ना खइले रहलीं । जइसे–जइसे एक के बाद एक झापड़ पड़त जाए ओइसे –ओइसे हमरे रोवाई क सुर ऊँचा होत जात रहे । अबहीं हमार रोवा–रोहट चलते रहल कि समियाना में हड़कम्प मच गइल । जेके जहाँ से दवर मिलल उंहवें से भाग निकलल । एह भागा दौड़ी में बाबा न जाने कहाँ चल गइलन । नचनिया–गवनिया लोग मंच के पीछे लुका गइलन । भगदड़ में भागत–परात हमके इहे देखाइल कि पगली आजी जे हमरे आजी क सखी रहलीं दुनू हाथ से मोटका डण्डा भांजत मरद लोग के मारत–दहाड़त एकदम रणचंडी बन गइल रहलीं । ऊ हमरे ओरी दउड़ल अवते रहलीं कि केहू हमके गोदी में उठवलस अउर मंच के पीछे अन्हरिया वाले हिस्सा में आके लुका गइल । बाद में जब चारो ओर शांति छा गइल त हमके गोदी में लेके ऊ बहरे अइलीं । पगलो आजी से हमार जान बचावे वाली ऊ उहे नचनिया रहलीं जे मंच पर सबसे आगे खड़ी होके गावत रहलिन .. सात सहेलियाँ खड़ी–खड़ी…..। हम उनकर उपकार एतरे चुकवलीं कि घरे जाके बाबा क पइसा लुटावे वाला बात आजी से ना बतवलीं ।
ओह दिन के बाद से पगलो आजी मय टोला–महल्ला मशहूर हो गइल रहलीं । हमार आजी त उनकर बखान करत ना थकें कि…’ सब हमरे सखी के पागल–पागल कह के लो–लो कइले रहेला न, देखा लोग जवने नीच–पातकिन (बाबा ओरी देख के) के बड़–बड़ जाना सुधार ना पवलन उनके छनभर में हमार सखी क डंटा सुधार दिहलस । ओह सुधार कार्य के बाद जब–जब पगलो आजी घरे आवं त हम डर के मारे लुका जाईं ।
कक्षा तीन के बाद गाँव छूट गइल । पहिले गरमी के छुट्टी में फिर बाद में तीज–त्यौहार,शादी–बियाह तक गाँवे आइल–गइल सिमट के रह गइल ।
एना पारी जब भाई के तिलक में गाँवे गइल रहलीं त पगलो आजी मिले–भेंटे आइल रहलीं । कुल्ह हाल –समाचार भइले के बाद हम पूछलीं कि —‘ए आजी !ओह दिनवा  क बतिया इयाद ह जब तू बरतिया में घुस के सबके ठोंकले–बजवले रहलू …।’ जबाब में आजी ठहाका मार के हँसत कहलीं …बाची हो ! नसेड़ी–भंगेड़ी ,पागल–छीतर अदमिन के होस–हवास में ले आवे खातिर केहू न केहू के त पागल बनही के न पड़ेला, बन गइलीं…आजो सब पागल–पागल कहे ला त कब्बो हँस के चुप लगा जाइला त कब्बो अन्हेरहूँ धउरा लिहीला ।
“त का कब्बो तोहके कवनों दिमागी बेमारी ना रहल ?”हम झिझकत–लजात पूछलीं ।
“अरे भक्क ! जइतू रानी…….अइसन कुल बेमारी रहत त महल–दुमहला तनात । बेटी–बेटा अपने–अपने घरे राज रजतन ।’  दुनू सखी, माने हमार आजी अउर पगलो आजी दुनू जनी हँसत–बिहँसत रहलीं अउर हम बाउर जस पगलो आजी के भाव–भंगिमा में ऊ पगली तलाशत रहलीं जवन सैकड़न के भीड़ में अक्केले दम पहुँच के हड़कम्प मचा दिहले रहल । पगलो आजी उहे हमार आजी क दुलारी सखी रहलीं जिनके एह कांड से पहिले दुल्हिन आजी कहल जात रहल अउर जिनके शील–संकोच अउर नाक के नीचे तक के घुँघुट क उदाहरण हर नइकी पतोह के दीहल जात रहल ।
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खजुरी, वाराणसी, भारत
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