• २०७९ असोज १९ बुधबार

प्रेम करते हो ?

राकेश मिश्र

राकेश मिश्र

प्रेम करते हो ?
एक दिन पूछ लिया उसने
आईना देखते हुए

हाँ मेरा उत्तर था

मैंने कहा
मै सोचता हूँ
तुम्हारी देह
उसमें होना
वैसे ही
जैसे तुम हो
देह में
मैं जीता हूँ
तुम्हारा जीवन
जैसे तुम जीती हो

मैं होना चाहता हूँ
वही
जो तुम हो
मै प्रेम करता हूँ

आत्मसंशय में थी वो
देखती रहती आईना
हम बात करते थे
जिनमें अक्सर देर होती थी
तब देर ही थी सबसे आवश्यक
प्रेम में
उसने कभी नहीं देखा
मेरी आँखों में

उसके साथ रहकर
मैंने उन स्त्रियों को बहुधा याद किया
जो नीले आकाश की पृष्ठभूमि में
ढूँढते अपना सुरभित विम्ब
गाँव के पोखर, तालाबों में समा गयीं

प्रेम में खुद को खोजना
जानलेवा होता है कभी कभी
चाहतें आगे जाती हैं
कहावतों से
मैंने पूछा
और तुम ?

सोचा नहीं– उसका उत्तर था
वह अभी भी देखती है
आईना

मै सोचता हूँ
प्रेम में खुद को ना खोज कर
अच्छा किया उसने ।
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लखनऊ, उत्तरप्रदेश, भारत
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