• २०७९ असोज १६ आइतबार

समाधान

 राजकुमार जैन राजन

राजकुमार जैन राजन

पीड़ा के दस्तावेजों पर
फिर मौन ने
कर दिए हस्ताक्षर
और
हसरतों की आँच पर
उबलती जिंदगी
बनकर रह गई
किसी सूखे वृक्ष के
ठूंठ की भांति
जहां
कभी नहीं उग पायेगी
ख्वाहिशों की नवीन फसलें

संघर्षों के ताप से
जिंदगी मोम की तरह
पिघलती रहती है
दाँव पर लग जाती है
इंसानियत
किस–किस से कहता फिरूं
अपना दुःख
चलते–चलते
सूरज भी हारा
सारी उम्र लगा दी माँ ने
तब जाकर इंसान बना
पावन गंगा जल–सा

जरूरत नहीं थी
संयोगों के जुड़ने की
बारिश में जैसे
रेत के घर का बिखर जाना
सिसकियों में
दरकता रहता हरदम अक्स
वक्त की सिलवटों में
उभर आये हैं
स्वप्न जीवन की प्रगति के
सवाल बस
समाधान का है
यह संकट इस सदी की
जिंदगी का है

स्मृतियों की घाटियों से
उगने लगता है
एक सूर्य
फिर समाधान का
संत्रास में जीता मन–पंछी
पंख फड़फड़ाता है
आसमान की किताब पर
स्वर्णिम अक्षरों में लिखता है
खूबसूरत होने की उम्मीद !
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शक

कौन खोले द्वार