धुंधली यादें - Aksharang
  • २०७७ चैत २९ आइतबार

धुंधली यादें

लालिमा घोष

लालिमा घोष

कभी-कभी ख्वाब तो
ख्वाब ही रह जाते हैं
बस ! मन को छू कर
तसल्ली थोड़ी दे जाते हैं
जैसे उनींदी नैनों ने
देखा हो कोई अनोखा
ना भुला सपना ।

जिंदगी की रफ्तार में
न जाने कौन कहां
मिल के बिछड़ जाते हैं
कभी तो अपने ही जो
पराए बन जाते हैं
और कभी कहीं-कहीं
पराए हो कर भी वो तो
लगते अपनों से अपने हैं ।

उम्र की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते
यादें कुछ होती धुंधली
पर बीती बचपन की
कट्टीश की दोस्ती
बसी रहती है दिल में
दीप्तिमान… जैसे
एक उज्जवल नक्षत्र !


हावडा पश्चिम बंगाल
lalimaghosh123@gmail.com