दो लघुकथाएं - Aksharang
  • २०७७ चैत २९ आइतबार

दो लघुकथाएं

डॉ मुक्ता

डॉ मुक्ता

काश ! तुम न आते
देश की सीमाओं पर तैनात मोहित, जिसने अभी ज़िंदगी के अठारह बसंत ही देखे थे, शहीद हो गया । यह समाचार मिलते ही पूरे गांव में सन्नाटा छा गया । चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई और आकाश ‘मोहित अमर रहे’ के नारों से गूंज उठा । परंतु उसके माता-पिता इकलौते बेटे को खो कर सकते में आ गए और मूर्छित हो गये । उनके क्रंदन से चहुंओर मातम पसर गया ।
मोहित समय से पहले आ पहुंचा था- अपनी लाडली बहन के हाथ पीले करने के लिए, जिसका वह वादा करके गया था । परंतु वह निर्जीव, चेतनहीन व स्पंदनहीन था । उसे देखते ही उसकी बहन उससे लिपटकर चीत्कार करने लगी और आंसुओं का सैलाब बह निकला ।
‘अच्छा वादा निभाया भैया ! तुम तो तुम मेरे लिए सुहाग का जोड़ा लाने वाले थे न…परंतु अब सब समाप्त हो गया ।’
‘काश ! तुम न आते… मैं थोड़ी देर के लिए नाराज़ हो जाती; मान-मनुहार करती; रो लेती, परंतु तुम्हारे लौटने की उम्मीद तो बनी रहती… एक आस बंधी रहती ।
परंतु उसकी रज़ा के सामने किसी की नहीं चलती, सभी को नतमस्तक होना ही पड़ता है ।

रुदाली
वह अपनी पहचान खो चुकी थी, क्योंकि पूरे गांव में वह रुदाली के नाम से जानी जाती थी । हर दिन कहीं ना कहीं से न्यौता आ ही जाता था और उसे अपने सब काम छोड़कर तत्काल जाना पड़ता था, क्योंकि उसे भी तो हरदम अपने रोज़गार की चिंता रहती थी । वैसे तो वह दिहाड़ीदार मज़दूर थी ।
आजकल प्रतिस्पर्द्धा का युग है । एक पद के लिए बहुत से उम्मीदवार प्रतीक्षारत रहते हैं । सो ! सभी को अपना कार्य में दक्षता का प्रदर्शन करना पड़ता है… न चाहते हुए भी रुदाली को ज़ोर-ज़ोर से चीखना-चिल्लाना और आंसू बहाने पड़ते हैं; उनका गुणगान करना पड़ता है; भले ही वह मानव के रूप में दानव रहा हो ।
परंतु यह दुनिया है । हर पात्र को अपना क़िरदार बखूबी अदा करना पड़ता है, क्योंकि जितने मनोयोग से वे अपना कार्य करती हैं, उसी के हिसाब से भुगतान किया जाता है ।
वैसे तो संबंधों को आजकल दीमक चाट गई है । परंतु अभी भी दुनियादारी के लिए संबंध ज़िंदा हैं । चलो ! इतना ही काफी है । लोग उस परंपरा को धरोहर-सम संभाल कर रखे हैं और रुदाली की अहम् भूमिका आज भी समाज में क़ायम है ।


(सुप्रसिद्ध लेखिका गुडगाँव नई दिल्ली, भारत ।)
drmuukta51@gmail.com