रुदाली - Aksharang
  • २०७८ असोज १२ मङ्गलबार

रुदाली

डा मुक्ता

डा मुक्ता

वह अपनी पहचान खो चुकी थी, क्योंकि पूरे गांव में वह रुदाली के नाम से जानी जाती थी । हर दिन कहीं ना कहीं से न्यौता आ ही जाता था और उसे अपने सब काम छोड़कर तत्काल जाना पड़ता था, क्योंकि उसे भी तो हरदम अपने रोज़गार की चिंता रहती थी । वैसे तो वह दिहाड़ीदार मज़दूर थी ।
आजकल प्रतिस्पर्द्धा का युग है । एक पद के लिए बहुत से उम्मीदवार प्रतीक्षारत रहते हैं । सो ! सभी को अपना कार्य में दक्षता का प्रदर्शन करना पड़ता है…न चाहते हुए भी रुदाली को ज़ोर-ज़ोर से चीखना-चिल्लाना और आंसू बहाने पड़ते हैं; उनका गुणगान करना पड़ता है; भले ही वह मानव के रूप में दानव रहा हो ।
परंतु यह दुनिया है । हर पात्र को अपना क़िरदार बखूबी अदा करना पड़ता है, क्योंकि जितने मनोयोग से वे अपना कार्य करती हैं, उसी के हिसाब से भुगतान किया जाता है ।
वैसे तो संबंधों को आजकल दीमक चाट गई है । परंतु अभी भी दुनियादारी के लिए संबंध ज़िंदा हैं । चलो! इतना ही काफी है । लोग उस परंपरा को धरोहर-सम संभाल कर रखे हैं और रुदाली की अहम् भूमिका आज भी समाज में क़ायम है ।


(भारत, दिल्ली निवासी मुक्ता चर्चित साहित्यकार हैँ ।)
drmukta51@gmail.com