जवानी का जंग - Aksharang
  • २०७८ असोज १२ मङ्गलबार

जवानी का जंग

गोलेन्द्र पटेल

गोलेन्द्र पटेल

बुरे समय में
जिंदगी का कोई पृष्ठ खोल कर
उँघते उँघते पढ़ना
स्वप्न में
जागते रहना है

शासक के शान में
सुबह से शाम तक
संसदीय सड़क पर सांत्वना का सूखा सागौन सिंचना
वन में
राजनीति का रोना है

अंधेरे में
जुगनूँ की देह ढोती है रोशनी
जानने और पहचानने के बीच बँधी रस्सी पर
नयन की नायिका नींद का नृत्य करना
नाटक के नाव का
नदी से
किनारे लगना है

फोकस में
घड़ी की सूई सुख- दुख पर जाती है बारबार
जिद्दी जीत जाता है
रण में
जवानी का जंग

समस्या के सरहद पर खड़े सिपाही
समर में
लड़ना चाहते हैं
पर सेनापति के आदेश पर देखते रहते हैं
सफर में
उम्र का उतार- चढ़ाव

दूरबीन वही है
दृश्य बदल रहा है
किले की काई संकेत दे रही है
कि शहंशाह के कुल का पतन निश्चित है
दीवारे ढहेंगी
दरबार खाली करो

दिल्ली दूह रही है
बिसुकी गाय
दोपहर में

प्रजा का देवता श्रीकृष्ण नाराज हैं
कवि के भाँति !


(काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिन्दी में आनर्स पटेल खजूरगाँव, चंदौली, उत्तरप्रदेश भारत निवासी हैं ।)
corojivi@gmail.com