सदा सुहागिन रहो ! - Aksharang
  • २०७७ फागुन १७ सोमबार

सदा सुहागिन रहो !

कल्पना मनोरमा

कल्पना मनोरमा

बेटी की शादी के बाद कुलदेवी की पूजा करवाने संजना भारत आई थी । अपने लोगों को अपने चारों ओर देख- सुनकर उसका मन लाल ऊँन के गोले- सा लुढ़का जा रहा था ।
‘देखा माँ, घर पापा के गुणगान गाता- सा लग रहा है।’ उसकी बेटी ने अपने घर की निहारते हुए कहा ।
‘सुहानी ये घर नहीं तेरे पापा का मन का मोती है । नजर मत लगा ।’
‘क्या मतलब माँ ?’ बेटी ने उत्सुकता से पूछा ।
‘तेरे पापा का कहना है कि घर छोटा हो या बड़ा, गरीब का हो या अमीर का, घरवाले को अपना घर सीपी के मोती- सा दिखता है ।’
‘माय ग्रेट डैडी ।’ दोनों खिलखिला पड़ीं ।
माँ- बेटी बातें कर ही रही थीं कि मन्दिर जाने के लिए साहिल का कुनबा जुट आया । चाची–ताई सगुन गाने लगीं और भाभियाँ हँसी- मज़ाक में ऐसी जुटीं कि रास्ता का पता न चला। विधि- विधान से पूजा संपन्न हुई तो सभी गाड़ी की ओर लौटने लगे ।
‘सुहानी, यहाँ आकर मत्था टेक ले फिर घर चलते हैं।’ संजना ने आवाज़ दी ।
‘ये तो नीले फूल वाली घास है ‘आई मीन टु से’ ये तो एक बेल है और मैं इसके आगे मत्था…?’ सुहानी ने विस्मय में भरकर कहा ।
‘सच कहा तूने… है तो ये बेल ही किन्तु मेरे जीवन में इसका महत्व, तेरी नानी से कम नहीं । मुझे आज भी याद है । पहली विदाई में तेरी नानी ने जब विष्णुकांता वाला गमला मेरे हाथ में रखा था तो लहराकर इसने मेरा माथा चूम लिया था सबको लगा मानो कृष्ण ने ही मुझे ‘सदा सुहागिन रहो’ का सुहाग- वरदान दिया हो ।’
‘देट्स टू गुड माँ ! लेकिन आपने फिर इसको यहाँ क्यों छोड़ दिया ?’
‘क्या- क्या ले जाती दूसरे देश और इसका फैलाव भी बहुत ज्यादा गाड़ी भर हो गया था इसलिए तेरे पापा ने इसे यहीं छोड़ना बेहतर समझा ।’
वहाँ से लौटकर बूढी संजना कमरों की दीवारों से कान लगा- लगाकर कुछ सुनने की कोशिश कर रही थी । वह अपने पुराने दिनों में खोती चली गयी ।
‘माँ, अब आप ये क्या कर रही हो ?’
‘साहिल के अनुसार, आदमी का जीवन गूँजों- अनुगूँजों के सहारे चलता है तो बस वही सुनने की चेष्टा कर रही थी ।’ माँ ने भीगे- से मन कहा और उसे यदा भी दिया कि आज उन दोनों को लौटने के लिए निकलना भी है ।
‘चिंता मत करो माँ, सब सेट है ।’ बेटी ने भावुक माँ को देखते हुए कहा ।
कहते- सुनते शाम को हल्दी के थापों से द्वार पूजन कर चौखट को संतुष्ट किया और दोनों माँ- बेटी स्नेहिल यादों को समेट अपने गंतव्य की ओर निकल पड़ी थीं । सुहानी यात्रा के सारे आयाम सम्हाल रही थी और संजना यादों की पोटली मौन भाव से सम्हाले जहाज की खिड़की से एक बार फिर आँखों से ओझल होते अपने शहर को देखे जा रही थी ।
‘माँ, अब थोड़ी देर आप इसे भी सम्हालोगी या यूँ ही ?’ काँच के छोटू से गमले में विष्णुकांता को देख वह उछल पड़ी । कुछ कहना चाहा तो बेटी ने मुँह पर हाथ रख दिया और खुद बोल पड़ी ।
‘माँ, मैं जानती हूँ अपनी धरती और प्रेम सिंचित वस्तुओं को छोड़ने में बहुत ताकत लगती है । और क्या नानी के प्यार पर मेरा थोडा भी अधिकार नहीं ?’
‘बच्चे माँ- पिता की अनुगूँज होते हैं ।’ कभी सुना था उसने आज बेटी की आवाज़ में साहिल की अनुगूँज सुनकर संजना की आँखें छलक पड़ी ।


(नई दिल्ली, भारत निवासी मनोरमा हिन्दी साहित्य की विदुषी और अध्यापिका हैँ । उन की अब तक तीन कृतियां और सहलेखन में दो कृतियां प्रकाशित हैँ ।)
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