मोहे चिन्ता न होय - Aksharang
  • २०७८ कातिर्क १० बुधबार

मोहे चिन्ता न होय

डॉ मुक्ता

डॉ मुक्ता

‘उम्र भर ग़ालिब, यही भूल करता रहा/धूल चेहरे पर थी, आईना साफ करता रहा’– ‘इंसान घर बदलता है, लिबास बदलता है, रिश्ते बदलता है, दोस्त बदलता है- फिर भी परेशान रहता है, क्योंकि वह खुद को नहीं बदलता ।’ यही है ज़िन्दगी का सत्य व हमारे दुःखों का मूल कारण, जहां तक पहुंचने का इंसान प्रयास ही नहीं करता । वह सदैव इसी भ्रम में रहता है कि वह जो भी सोचता व करता है, केवल वही ठीक है और उसके अतिरिक्त सब ग़लत है और वे लोग दोषी हैं, अपराधी हैं, जो आत्मकेंद्रितता के कारण अपने से इतर कुछ देख ही नहीं पाते । वह चेहरे पर लगी धूल को तो साफ करना चाहता है, परंतु आईने पर दिखाई पड़ती धूल को साफ करने में व्यस्त रहता है… ग़ालिब का यह शेयर हमें हक़ीक़त से रूबरू कराता है । जब तक हम आत्मावलोकन कर, अपनी गलती को स्वीकार नहीं करते- हमारी भटकन पर विराम नहीं लगता ।
वास्तव में हम ऐसा करना ही नहीं चाहते । हमारा अहम् हम पर अंकुश लगाता है, जिसके कारण हमारी सोच पर जंग लग जाता है और हम कूपमंडूक बनकर रह जाते हैं । हम जीवन में अपनी इच्छाओं की पूर्ति तो करना चाहते हैं, परंतु उचित राह का ज्ञान न होने के कारण अपनी मंज़िल पर नहीं पहुंच पाते । हम चेहरे की धूल को आईना साफ करके मिटाना चाहते हैं । सो ! हम आजीवन आशंकाओं से घिरे रहते हैं और उसी चक्रव्यूह में फंसे, सदैव चीखते- चिल्लाते रहते हैं, क्योंकि हममें आत्मविश्वास का अभाव होता है । यह सत्य ही है कि जिन्हें खुद पर भरोसा होता है, वे शांत रहते हैं तथा उनके हृदय में संदेह, संशय, शक़ व दुविधा का स्थान नहीं होता । वे अंतर्मन की शक्तियों को संचित कर निरंतर आगे बढ़ते रहते हैंस कभी पीछे मुड़कर नहीं देखते । वास्तव में उनका व्यवहार युद्धक्षेत्र में तैनात सैनिक के समान होता है, जो सीने पर गोली खाकर शहीद होने में विश्वास रखता है और आधे रास्ते से लौट आने में भी उसकी आस्था नहीं होती ।
परंतु संदेहग्रस्त इंसान सदैव उधेड़बुन में खोया रहता है- सपनों के महल तोड़ता व बनाता रहता है । वह अंधेरे में गलत दिशा में तीर चलाता रहता है । इसके निमित्त वह घर को वास्तु की दृष्टि से शुभ न मानकर उस घर को बदलता है, नये- नये लोगों से संपर्क साधता है; रिश्तों व परिवारजनों तक को नकार देता है; मित्रों से दूरी बना लेता है… परंतु उसकी समस्याओं का अंत नहीं होता । वास्तव में हमारी समस्याओं का समाधान दूसरों के पास नहीं- हमारे ही पास होता है । दूसरा व्यक्ति आपकी परेशानियों को समझ तो सकता है, आपकी मनःस्थिति को अनुभव कर सकता है, परंतु उस द्वारा उचित व सही मार्गदर्शन करना कैसे करना व समस्याओं का समाधान करना कैसे संभव होगा ?
रिश्ते, दोस्त, घर आदि बदलने से आपके व्यवहार व दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं आता; न ही लिबास बदलने से आपकी चाल- ढाल व व्यक्तित्व में परिवर्तन होता है । सो ! आवश्यकता है- सोच बदलने की; नकारात्मकता को त्याग सकारात्मकता अपनाने की, हक़ीक़त से रू-ब-रू होने की, सत्य को स्वीकारने की । जब तक हम इन्हें दिल से स्वीकार नहीं करते, हमारे कार्य-व्यवहार व जीवन- शैली में लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आता ।
‘कुछ हंसकर बोल दो/कुछ हंस कर टाल दो÷परेशानियां बहुत हैं/कुछ वक्त पर डाल दो’ में सुंदर व उपयोगी संदेश निहित है । जीवन में सुख-दुःख, खशी-ग़म आते-जाते रहते हैं । सो ! निराशा का दामन थाम कर बैठने से उनका समाधान नहीं हो सकता । इस प्रकार वे समय के अनुसार विलुप्त तो हो सकते हैं, परंतु समाप्त नहीं हो सकते । इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध के विचार बहुत सार्थक प्रतीत होते हैं । जीवन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि हम सबसे हंस कर बात करें और अपनी परेशानियों को हंस कर टाल दें, क्योंकि समय परिवर्तनशील है और यथासमय दिन-रात व ऋतु- परिवर्तन अवश्यंभावी है । कबीरदास जी के अनुसार ‘ऋतु आय फल होय’ अर्थात् समय आने पर ही फल की प्राप्ति होती है । लगातार भूमि में सौ घड़े जल उंडेलने का कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि समय से पहले व भाग्य से अधिक किसी को संसार में कुछ भी प्राप्त नहीं होता । इसी संदर्भ में मुझे याद आ रही हैं स्वरचित मुक्तक संग्रह ‘अहसास चंद लम्हों का’ की पंक्तियां ‘दिन रात बदलते हैं / हालात बदलते हैं / मौसम के साथ- साथ/ फूल और पात बदलते हैं ।’ इसी के साथ मैं कहना चाहूंगी, ‘ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं’ अर्थात् समय व स्थान परिवर्तन से मनःस्थिति व मनोभाव भी बदल जाते हैं/जीवन में नई उमंग- तरंग का पदार्पण हो जाता है और ज़िन्दगी उसी रफ़्तार से पुनः दौड़ने लगती है ।
चेहरा मन का आईना है, दर्पण है । जब हमारा मन प्रसन्न होता है, तो ओस की बूंदे भी हमें मोतियों सम भासती हैं और मन रूपी अश्व तीव्र गति से भागने लगते हैं । वैसे भी चंचल मन तो पल भर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है । परंतु इससे विपरीत स्थिति में हमें प्रकृति आंसू बहाती प्रतीत होती है/ समुद्र की लहरें चीत्कार करने भासती हैं और मंदिर की घंटियों के अनहद स्वर के स्थान पर चिंघाड़ें सुनाई पड़ती हैं । इतना ही नहीं, गुलाब की महक के स्थान पर कांटो का ख्याल मन में आता है और अंतर्मन में सदैव यही प्रश्न उठता है, ‘यह सब कुछ मेरे हिस्से में क्यों ? क्या है मेरा कसूर और मैंने तो कभी बुरे कर्म किए ही नहीं ।’ परंतु बावरा मन भूल जाता है कि इंसान को पूर्व- जन्मों के कर्मों का फल भी भुगतना पड़ता है । आखिर कौन बच पाया है… कालचक्र की गति से ? भगवान राम व कृष्ण को आजीवन आपदाओं का सामना करना पड़ा । कृष्ण का जन्म जेल में हुआ, पालन व्रज में हुआ और वे बचपन से ही जीवन- भर मुसीबतों का सामना करते रहे । राम को देखिए, विवाह के पश्चात् चौदह वर्ष का वनवास/सीता-हरण/ रावण को मारने के पश्चात् अयोध्या में राम का राजतिलक/ धोबी के आक्षेप करने पर सीता का त्याग/ विश्वामित्र के आश्रम में आश्रय ग्रहण/ सीता का अपने बेटों को अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ने पर सत्य से अवगत कराना/ राम की सीता से मुलाकात/ अग्नि-परीक्षा और अयोध्या की ओर गमन । पुनः अग्नि-परीक्षा हेतु अनुरोध करने पर सीता का धरती में समा जाना’ क्या उन्होंने कभी अपने भाग्य को कोसा ? क्या वे आजीवन आंसू बहाते रहे ? नहीं, वे तो आपदाओं को खुशी से गले से लगाते रहे । यदि आप भी खुशी से कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो ज़िन्दगी कैसे गुज़र जाती है- पता ही नहीं चलता, अन्यथा हर पल जानलेवा हो जाता है।
इन विषम परिस्थितियों में दूसरों के दुःख को सदैव महसूसना चाहिए, क्योंकि यह इंसान होने का प्रमाण है । अपने दर्द का अनुभव तो हर इंसान करता है और वह जीवित कहलाता है । आइए ! समस्त ऊर्जा को दुःख निवारण में लगाएं । खुद भी हंसें और संसार के प्राणी- मात्र के प्रति संवेदनशील बनें/आत्मावलोकन कर अपने दोषों को स्वीकारें । समस्याओं में उलझें नहीं, समाधान निकालें । अहम् का त्याग कर अपनी दुष्प्रवृत्तियों को सद्प्रवृत्तियों में परिवर्तित करने की चेष्टा करें । गलत लोगों की संगति से बचें। केवल दुःख में ही सिमरन न करें, सुख में भी उस सृष्टि- नियंता को भूलें नहीं… यही है दुःखों से मुक्ति पाने का मार्ग, जहां मानव अनहद- नाद में अपनी सुधबुध खोकर, अलौकिक आनंद में अवगाहन कर राग- द्वेष से ऊपर उठ जाता है । इस स्थिति में वह प्राणी- मात्र में परमात्मा- सत्ता की झलक पाता है और बड़ी से बड़ी मुसीबत में परेशानियां उसका बाल भी बांका नहीं कर पातीं । अंत में कबीरदास जी की पंक्तियों को उद्धृत कर अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगी,
‘कबिरा चिंता क्या करे, चिंता से क्या होय
मेरी चिंता हरि करे, मोहे चिंता ना होय ।’
चिंता किसी रोग का निदान नहीं है । इसलिए चिंता करना व्यर्थ है । परमात्मा हमारे हित के बारे में हम से बेहतर जानते हैं, तो हम चिंता क्यों करें ? सो ! हमें उस पर अटूट विश्वास करना चाहिए, क्योंकि वह हमारे हित में हमसे बेहतर निर्णय लेगा ।


(वरिष्ठ लेखिका, हिन्दी अकादमी हरियाणा की पूर्व निदेशक गुडगाँव, हरियाणा, भारत)
drmukta51@gmail.com