घर - Aksharang
  • २०७७ चैत २९ आइतबार

घर

गोपाल अश्क

गोपाल अश्क

रामलाल आपन बेटा श्याम के विदेश से घरे लौटल देख के खुशी से ज्यादा चिंतित रहलें । काहेकि ऊ अपना बेटा के विदेश भेजे में आपन जीवन भर के कमाई के फूँक देले रहलें । अपना आँखि के सोझा आपन आँख के तारा के पाके उनका खुश होखे के चाहत रहे, पत्थर पर जामल दूभ के देखके खुशी के मारे दुभे लेखा लहलहा जाए के चाहत रहे । बाकिर उनकर खुशी कपूर लेखा कहीं उड़ गइल रहे । उनका आँखि के सोझा अन्हरिया घेरले रहे । एकर वजह रहे, माला के मोती लेखा टूट के बिखरत नजर आवत उनकर सपना । उनका जीवन में उनकर सपना सपना दू बेर माटी के घर लेखा भहरा के गिरल रहे । एक बेर त, ओह बेरा, जब श्याम, उनका के बिछौना पर बेमरतिआह आ रोअत-कल्पत छोड़ के विदेश जाए खातिर पइसा मंगले रहे आ दोसर एह बेरा, जब श्याम आपन विदेश में रहे के सपना अचके तोड़ के घरे लौट गइल रहे । दुनू बाप बेटा एक दोसरा के अकचका के देखत रहे लोग । दुनू जने के आँख में सवाल नजर आवत रहे- ई का ? आ काहे ? बाकिर केहू केहू से कुछो ना पूछे । बस एक दोसरा के आश्चर्य भरल नजरी से देखत रहे । श्याम, जवन खुदे आपन विदेश में जीवन बितावे के सपना के टूट गइला से बिखर के आपन स्वदेश आ घरे आवे पर मजबूर भइल रहे, ऊ आपन बाप के एह मनोदशा देख के काफी अकचका गइल रहे, एक तरह से दुःखी रहे । ऊ ई समझ ना पावत रहे, कि ऊ घरे लौटला पर खुश होखो कि दुखी । बाकिर श्याम के माई के बात त कुछ अउरी रहे । ओकरा माई के आँख में ओहू बेरा लोरे हिलोर मारत रहे, जब ओकर बेटा एयरपोर्ट पर देखते-देखते आँख से ओझल हो गइल रहे । देखते-देखते उड़ गइल रहे ओकर जहाज । ओह बेरा ओकर मन कुहुक-कुहुक के इहे गावत आइल रहे- जहिया चिरई अँखफोर हो जाले, तहिए आकाश के कोर हो जाले । उड़ गइल आकाशे खोंता से चिरइया, देखत रह उजड़ल खोंता के घरवइया । आ एहू बेरा, ओकरा आँख में लोरे हिलोर मारत रहे । फरक एतने रहे कि एह बेरा के ओकर लोराइल आँख में बेटा के घरे लौटला के अपार खुशी रहे ।
रात में खाना-वाना खइले के बाद, दुनू बाप बेटा आपन-आपन कोठरी में सुते चल गइलें । श्याम के माई के नीन ना पड़त रहे, जइसे नीन आँख से कोसो दूर चल गइल होखे । नीन त श्याम के बापो के आँख में ना रहे । बाकिर दुनू जने करवट बदल के सुते के नाटक करत रहलें । जब आधा रात बीतल, आ श्याम के माई से बर्दाश्त ना भइल त, ऊ अपना मरद का ओर करवट बदल लेहली । रामलाल के आँख देख के साफ पता चलत रहे कि ऊ सुतल नइखन, जागल बाड़न । काहेकि आँख के पपनी मुलूर-मुलूर करत रहे । श्याम के माई उठ के बइठ गइली । अब रामलाल अपना के रोक ना पवलें आ उहो उठ के बइठत पूछलें ‘का भइल ? काहे नइखू सुतत ? तहरा त काफी खुश होखे के चाहीं कि तहर दुलरूवा बेटा घरे लौट आइल बा ।’
‘आ काहे, राउर दुलरूवा नइखे आइल का ? ऊ खाली हमरे बेटा त ना ह ? राउरो ह ।’
‘हम ई कहाँ कहतानीं  कि ऊ हमर बेटा ना ह ।’
‘त फेर रउआ बेटा के देख के खुश काहे नइखीं ? हम देखतानीं, जब से बउआ आइल बा, राउर बरताव बदल गइल बा । हमरा अइसन काहे बुझाता कि रउआ ओकरा अइला से खुशी नइखीं ।’
‘साँच कहब, त तहरा बड़ा तकलीफ होई, आ झूठ हम कहे के नइखीं चाहत । सुत जा, ना त मिआज खराब हो जाई ।’
‘जेकर आदमी चिंता के आग में जरत होखे, ऊ कइसे सुत पाई, ओकरा नीन कहाँ से पड़ी । काहे रउआ एतना चिंता करतानीं । छोड़ीं ना, जे हो गइल से हो गइल ।’
‘हमर माई बाप के बनावल घर त ना रहल नू । ओरा परा गइल नू । एकरा अगर एह तरे लौट के आवे के रहल, त गइल काहे ला ?’
‘एह तरे के मतलब ? आ ई एकर घर ह, इहाँ ना आइत, त कहाँ जाइत ?’
‘एह तरे के मतलब हमनीं के वीरगंज के घर-दुवार के ओरवा-परवा के । एकरे विदेश जाए खातिर नू हमरा आपन घर बेंचे के पड़ल । आ ई खाली हाथ लौट आइल ।’
‘रउअ कइसे कह सकतानीं कि बउआ खाली हाथ लौटल बा । बिहान होखे दीं, हम बतियायेब । हमरा विश्वास बा, बउआ कुछ ना कुछ कमा के जरूरे आइल होई ।’
‘कहल गइल बा- होनहार लइका, हगते में चिन्हाला । अगर ई भरल-पूरल आइल रहित, त एकर आंगछे दोसर होइत ।’
‘अच्छा चलीं, शांत हो जाईं । चलीं, सुतीं, फरिछ होखे लागल बा । सारा रात अइसहीं बीत गइल ।’
आपन मेहरारू के बात सुन के रामलाल सुते के कोशिश करे लगलें । बाकिर केतनो कोशिश कइला के बावजूद उनका नीन ना पड़ल आ देखते-देखते भोर हो गइल । भोर पहर का जाने कइसे उनकर आँख लाग गइल, पते ना चलल । उनकर मेहरारू आपन नियत समय पर उठ गइली । दैनिक कर्म से निपटारा पाके रसाईघर में घुसली, चाय बनावे लगली । आज उनकर खुशी के ठिकाना ना रहे । खुशी के मारे गोड़ जमीन पर ना टिक पावे, रह-रह के उठ जाए । आज दू गो के बदला चार गो गिलास उठल, ई खुशी के चिन्हे त रहल । गिलास में चाय छान के खुशी से गदगद होत आपन बेटा के कमरा के दरवाजा खटखटवली-‘बउआ, ए बउआ । बहू ए बहू । केंवाड़ी खोल लोगन । चाय पी ल लोगन ।’ तनिका देर के बाद केंवाड़ी खुलल । सामने श्याम खड़ा नजर अइलें । माई के हाथ से चाय लेत मुस्कियात कहलें- ‘हमनी का अइसन चाय ना पिएनी सँ माई,  हमनीका ग्रीन टी पिएनी सँ ।’
‘हमरा मालूम ना रहल ह बाबू । चल आज पी ल, बिहान से ग्रीन टी बना देब ।’ श्याम के माईयो मुस्कियात कहली ।
माई के बात सुन के श्याम चुपा गइलें आ उनका हाथ से चाय के गिलास ले लिहलें । हाथ में चाय के गिलास ले- ले कमरा से बाहर निकल गइलें । उनकर माई रसोई घर में फेर से चल गइली । उहो अपना माई के पाछा-पाछा रसोई घर में गइलें । उनकर माई के ई समय अनुकूल लागल, एही से ऊ बतियाए लगली-‘बबुआ । अउरी सुनाव, का हाल खबर बा ? एह तरे अचानक कइसे लौट अइल सभे ?
‘काहे माई ? हमरा के तरे आवे के चाहत रहल ह ? आ कि हमरा इहाँ आवे के चाहते ना रहल ह ?’
‘कइसन बात करताड़ बाबु ? ई तहनी के घर ह, इहाँ आवे खातिर ना कवनो समय चाहीं आ ना कवनो तौर तरीका । हम त बस इहे पूछनीं हँ कि ओहिजा सब ठीक ठाक रहल ह नू ? तूँ त छ महीना खातिर हमरा के बोलावत रहल ह ।’
‘माई, बस एतने समझ जो कि ओहिजा रहे के कानूनी अधिकार ना रहल, अब चोर लेखा लुका-छुपा के का रहीं, आ कइसे रहीं ।’ श्याम कहलें ।
‘बड़ा ठीक कइल ह, आपन देश, आपन घरे चल अइल, हम त बड़ा खुश बानीं ।’ श्याम के माई आपन मन के बात कहली ।
‘बाकिर बाबूजी खुश नइखीं लागत माई । हमरा लागता कि हमर लौटल उहाँका निमन ना लागल ।’ श्याम कहलें ।
‘का बात करताड़ बाबू । अरे उनका कवनो दोसर बात के चिंता धइले होई । आ तूँ त जानताड़ अपना बाप के, बड़ा अन्तर्मुखी हई । उहाँका कब खुश रहिलें आ कब दुःखी, पते ना चले ।’ अच्छा एगो बात पूछीं ?
‘पूछ ।’ श्याम के कहला पर उनकर माई पूछली- ‘कुछ कमा ओमा के लिआइल बाड़ न ।’
‘लिआइल त बानीं, बाकिर हमनी एहिजा घर बनावे के सोचले बानीं सँ ।’ श्याम के ई बात सुनके उनकर माई के बौआई ध लेलस, बोलली- ‘काहे ? आपन ई घर त बड़ले बा । ई घर त तहरे ह नू । फेर दोसर घर के का जरूरी बा ?’
‘बात ई बा माई कि हमर मेहरारू एह घर के संस्कार आ संस्कृति में नइखे रह सकत । तूँ त जानत बाड़ू कि हमर अंतर्जातीय प्रेम विवाह ह, एह घर के तौर तरीका में ओकरा एडजस्ट कइल बड़ा मुश्किल बा । आ खाली ओकरे ना, अब त हमरो काफी मुश्किल होई ।’
श्याम के माई के पैर के नीचे के जमीन सरक गइल । ऊ आसमान से टूट के गिरल तारा लेखा हो गइली । आँख में लोर भर गइल । बड़ा मुश्किल से अपना के सम्हरली, आँचर से लोर पोछत कहली- ‘ई तूँ का कहताड़ बउआ ? अब हमनीका एह उमीर में केकरा सँगे आ कइसे रहब सँ ?’
‘तूँ ई समझिलहे माई कि हम विदेश से लौटले नइखीं ।’ एकर बाबू माई दहेज में दू आना जमीन देले बा, ओही पर हमनीका घर बनावे जा रहल बानी सँ ।’ एतना कहके श्याम आपन कमरा में चल गइलें । उनकर माई अपना के रोके ना सकली, लगली फफक- फफक के रोवे ।
ओकरा बाद रामलाल के सँगे-सँगे उनकर मेहरारूरो अर्थात् श्याम के माईओ चिंतित रहे लगली । पहिले बेटा नजर से दूर रहे, बाकिर मन से दूर ना रहे । बाकिर अब बेटा नजर के सामने भइला के बावजूद, धीरे-धीरे मन से दूर होत जात रहे । अब ऊ चुप्पी साध लेहली । रामलाल त पहिलहीं से चुपा गइल रहलें । एक दिन सबेरे-सबेरे श्याम अपना मेहरारू के साथे ई कहत घर से निकललें कि ऊ आपन ससुरार जाताँड़े । उनकर माई एतने कह पवली- ‘जल्दी से घरे आ जइह ।’ ओकरा बाद श्याम त घरे अइलें, बाकिर उनकर मेहरारू ना अइली । ऊ आपन नइहरे में रह गइली । पेट से रहली, आठवा महीना चलत रहे । ई अच्छा बहाना हो गइल, नइहर में रहे के । श्याम घरे आवत–जात रहलें । ओने घर बने लागल । दू चार महीना में घर बनके तैयार हो गइल । जे सुने ऊ रामलाल के बधाई देवे-‘चलीं, काठमांडू में दू-दू गो घर हो गइल ।’ रामलाल कुछ ना कह पावस, मन मसोस के रह जास । घर के नेंव रखाइल, एकर जानकारी मिलल, गृह प्रवेश भइल, एकरो जानकारी मिलल, घर देखे के नेवतो मिलल । एह बीच में श्याम के बेटा भइल, मतलब रामलाल आ उनकर मेहरारू के पोता । एह लोग के जीवन में वंश के वृद्धि त भइल, बाकिर पोता के सँगे खेले-खेलावे के मौका पहिलके मुलाकात में खत्म हो गइल । बात ई भइल कि ई दुनू प्राणी गृह प्रवेश के दिने गइल रहे लोग । हालाँकि केतनो कहला-सुनला के बावजूद एह लोग के मुताबिक गृह पूजा ना भइल, ई कहल गइल कि गृह पूजा नइखे होत । बाकिर जब ई लोग उहाँ पहुँचल त गृह पूजा भइल के संकेत देखलस । मन त ओही बेरा खट्टा हो गइल । बाकिर पोता देखे के ललक में ई लोग मन के सम्हरलस आ घर के भीतर गइल ।
खान-पीन भइल । घर बड़ा निमन बनल रहे । दू तल्ला घर रहे । ई दुनू प्राणी आपन पोता के खेला के ओकरा सँगे हँस खेलके जुड़ा गइल । एने ओने के बात होखे लागल । श्याम आ उनकर मेहरारू पास में बइठल रहे । बतियात रहे सभे । श्याम के माई बड़ा खुश होत कहली- ‘बबुआ के बाबूजी, रउआ बेकारे में नू चिंता करेनी । देखीं त, हमनी के बउआ केतना सुंदर घर बनवले बा । वीरगंज के घर बेंचा गइल त का भइल, एहिजा काठमांडू मे त दू- दू गो घर हो गइल नू ।’ रामलाल अभीन आपन मन के बात इजहार करहीं के रहलें तले श्याम तपाक से बोल पड़ल- ‘माई, ऊ तोर घर ह, ई हमर घर ह । जब मन करे चल अइहे । बाबूजी, हम अपनहूँ के कहतानीं ।’
ई सुनते दुनू प्राणी गाछ पर से टूट के गिरत पत्तई लेखा उधियाए लगलें । आँख के सोझा आपन-आपन घर नजर आवे लागल ।


(नेपाली, भोजपुरी एवं हिन्दी में अनेकों कृतियाँ प्रकाशित । सक्रिय लेखन । काठमान्डू)
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