खरी कविता - Aksharang
  • २०७७ कातिर्क १३ बिहीबार

खरी कविता

आर के पालीवाल

आर के पालीवाल

बहुत से लोगों को
तनिक अच्छी नहीं लगती खरी कविता
खासकर उन्हें
जिन्हे रास नहीं आता
किसी भी चीज का खरापन

कृत्रिमता के आवरण में
निर्लज्जता से ढका है जिनका जीवन
कविता का खरापन
मन में छोड़ता है
वैसा ही कसैला स्वाद
जैसा जीभ पर छोड़ता है

समुद्र के पानी का खारापन
जैसे रह रह कर टीसता है
पुरानी गहरी चोट का हरापन
वे कवि जो लिखते हैं खरी कविता
भले ही खारिज कर दिए जाएं
समकालीन समीक्षकों संपादकों द्वारा
जनता की नब्ज तक पहुंचता है
कविताओं का खरापन ही
कालजयी होती हैं कविताएं
अपने खरेपन से ही  !


(हैदराबाद, भारत निवासी पालीवाल गांधीवादी विचार में निरन्तर लेखन में सक्रिय हैं । उन की दो उपन्यास, पांच कहानी और व्यंग्य संग्रह, एक कविता संग्रह और एक नाटक प्रकाशित है)
rkpaliwal1986@gmail.com