मुक्तक - Aksharang
  • २०७७ श्रावाण २७ मङ्गलबार

मुक्तक

दिनेश गुप्ता

दिनेश गुप्ता


जे ना सहेके ऊ सह जाइले
खून के घूँट पिके रह जाइले
कवनो उपाय ना लउके तब
लोर बनके आँख से बह जाइले ।

चोर चोर मौसेरा भाई
तुही बताव केने जाईं
राजनीति बा उबड़खाबड़
एने कुआँ ओने खाई ।

जीत अब हार जइसन लागेला
दोस्त गद्दार जइसन लागेला
समय आ गइल कइसन देखीं
साहिल मजधार जइसन लागेला ।

दान देहनी त का भइल
मान देहनी त का भइल
ओककरा माँगे के आदत बा
जान देहनी त का भइल ?

हार के बुनियाद पर जीत के घर बनेला
त्याग के बुनियाद पर मीत के घर बनेला
प्रीत करिह त हर वक्त याद रखिह
वफा के बुनियाद पर प्रीत के घर बनेला ।

पछिया आइल सब उड़ा ले गइल
कुछियो ना बँचल पूरा ले गइल
बाढ आइल जीवन में अइसन का कहीं
अँखिया के पनिया बहा ले गइल ।

ऊ सुते हमरे निने आ हमरे निने जागेला
स्वार्थ रहित सेवा ऊ हमार करत रहेला
गाँधी, मंडेला ऊ ना बन जाए कहीं
इसे सोचके हमार हृदय जरत रहेला ।

सपना के महल एके पल में ढह गइल
हमरा खातिर दुनिया में कुछ ना रह गइल
स्वच्छ निर्मल जल रहे जिनगी के नदी में
अइसन दाहर आइल कि सब बह गइल ।
९.
देख के तु मुस्कुरा रहल बाड़
लागता कुछ लुका रहल बाड़
दुख के पहाड़ मुड़ी पर राख के
खुशी के खबर सुना रहल बाड़ ।
१०
हृदय रो रहल बा बताई के तरे ?
बा कहल जरुरी लुकाई के तर ?
पीब भरला से घाव टभकता
दर्द बेजोड़ बा बहाईं के तरे ?
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(वीरगंज-भोजपुरी भाषा में निरन्तर लेखन । पूर्व प्रज्ञा–सभा सदस्य, नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान)
bhojpurinepal@gmail.com