रेणु की रसप्रिया - Aksharang
  • २०७७ चैत २९ आइतबार

रेणु की रसप्रिया

 डॉ. श्वेता दीप्ति

डॉ. श्वेता दीप्ति

हिन्दी कथा साहित्य में फणीश्वरनाथ रेणु मील का पत्थर हैं । माना जाता है कि रेणु प्रेमचंद की परम्परा के एकमात्र कथाकार हैं । रेणु प्रेमचंद की विरासत हैं या नहीं, यह विषय विवादित हो सकता है, लेकिन इतना तो निर्विवाद है कि नई कहानियों की धारा में रेणु की नाव सबसे आगे है । रेणु की पहली कहानी संग्रह ठुमरी नाम से प्रकाशित हुई थी और इस संग्रह की रसप्रिया कहानी अपने प्रथम प्रकाशन के साथ ही जनप्रिय बन गई । रसप्रिया रेणु की अत्यन्त ही सधी हुई कहानी है । इसमें ग्रामीण जीवन की सौरभ श्री से निकला हुआ कलाकार के मन का संगीत फूटा है, इसीलिए इस कहानी में प्रकृति के अपरूप–यौवन और सौंदर्य के अनेकानेक चित्र भी अनायास आ जाते हैं । रस खोजी सामाजिक सम्बन्धों को नितान्त आत्मीय ढंग से देखा दिखाया है और देहाती जीवन में प्रेम के आड़े तिरछे रूप का निर्देश किया है, यह उनकी विलक्षण प्रतिभा और ग्राम्य जीवन के साथ अटूट लगाव का प्रमाण है । इस कहानी में अमानवीय परिस्थितियों के बीच भी मानवीयता के विकास का चित्रण हुआ है, क्योंकि कहानीकार की आस्था मानवीय विकास के प्रति अखण्ड रूप से सजग रही है । यह ध्यान देने की बात है कि रेणु मानवीयता का विकास सामान्य जन–जीवन में देखते हैं और मनुष्य विरोधी शक्तियों के रूप में वे सामंत वर्ग तथा उसकी सामाजिक मान्यताओं को दिखाते हैं । रेणु की मानवीयता का स्रोत लोक संस्कृति है । रसप्रिया का मिरंदगिया हो या तीसरी कसम का हिरामन उसके जीवन, सामाजिक सम्बन्धों, सोच और भावनाओं में विरोधी परिस्थितियों के बावजूद मानवीयता का विकास दिखाई देता है ।

रेणु के विचार से समाज में मानवीयता के अस्तित्व और विकास को सामंती मूल्य व्यवस्था निगल जाने के लिए हरदम तैयार रहती है । वे यह भी मानते हैं कि निश्चल मानवीयता को वर्ग भेद, शोषण, गरीबी और फरेबी राजनीति से हमेशा खतरा है । उनके अनुसार समाज में जिस मानवीयता का दमन होता है वहाँ समाज विरोधी मनुष्य बढ़ते हैं, और जो शक्तियाँ मानवीयता का दमन करती हैं वे ही समाज विरोधी मनुष्यों को बढ़ावा देती हैं । इसलिए रेणु अपनी कहानियों में ऐसी समाज व्यवस्था और शक्तियों का असली रूप बेपर्दा कर देते हैं । वे हर जगह लोक संस्कृति में मानवीयता के विकास की सम्भावनाएँ देखते हैं । यही कारण है कि वे समाज को मानवीय और मनुष्य को सामाजिक बनाने के उद्देश्य से लोक संस्कृतिमूलक समाज के गठन की बात करते हैं । शोषण और उत्पीड़न से भरी अमानवीय स्थिति में जीने वाली जनता सौंदर्य और रस से भरी–पूरी ऐसी जन–संस्कृति की रचना करती है जिसमें उसके जीवन की वास्तविकताएँ और आकांक्षाएँ व्यक्त होती हैं, उसकी मानवीयता प्रकट होती है । रेणु का दृष्टिकोण सामाजिक मनुष्य और मानवीय समाज बनाने पर केन्द्रित रही है, इसलिए वे अपनी प्रत्येक कहानी में इंसान और इंसानियत की तलाश करते हैं । यह तलाश बौद्धिक स्तर पर नहीं बल्कि रागात्मक धरातल पर होती है । इसलिए रेणु अपनी कहानी में स्थितियों के विश्लेषण से अधिक अनुभवों की अभिव्यक्ति पर अधिक जोर देते हैं । उनका यह दृष्टिकोण रसप्रिया कहानी में और भी तरल होकर बहा है । मिरदंगिया के व्यक्तित्व में विभिन्न जीवन संदर्भों में मानवीयता के अलग अलग रूप और पक्ष उजागर हुए हैं ।

आज जीवन से रस ही गायब होता जा रहा है जो कथाकार को पीड़ा देता है । उनका रसजीवी कथाकार रसप्रिया के संगीत को सामान्य व्यक्ति के सामाजिक संदर्भों में देखना चाहता है । रेणु जानते हैं कि, अकेला जीवन एक रस होने को अभिशप्त है, क्योंकि एकाकीपन का अंधकार, दुस्सह है इसका मूक भार । इसलिए वे विरहा, चाँचर, लगनी, बारहमासा तथा रिमझिम वर्षा और चिलचिलाती धूप में लोक रस प्राप्त करते हैं । आखिर रसप्रिया है क्या ? रेणु लिखते हैं, विद्यापति नाचने वाले रसप्रिया गाते थे । सहरसा के जोगेन्दर झा ने विद्यापति के बारह पदों की एक पुस्तिका छपाई थी । मेले में खूब बिक्री हुई थी, रसप्रिया पोथी की । विदापत नाचने वाले ने गा–गाकर जनप्रिया बना दिया था, रसप्रिया को ।

रेणु को चिंता है कि रसप्रिया का राग जन–जीवन से क्यों मर रहा है—जेठ की चढ़ती दोपहरी में खेतों में काम करने वाले भी अब गीत नहीं गाते हैं । कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जाएगी क्या ? ऐसी दोपहरी में चुपचाप कैसे काम किया जाता है ? पाँच साल पहले तक तो लोगों के दिल में हुलास बाकी था । पहली वर्षा से भीगी हुई धरती के हरे–भरे पौधों से एक खास किस्म की गंध निकलती है । तपती दोपहरी में मोम की तरह गल उठती थी रस की डाली, वे गाने लगते थे विरहा, चाँचर, लगनी…।
हाँ..रे, हल जोते हलवाहा भैया रे…
खुरपी रे चलावे..म..ज..दू..र ।
एहि पन्थे, धनी मोरा हे रुसलि… ।

रेणु की चिंता यही है कि जन जीवन से रस की धार सूखी जा रही है लोक संस्कृति मर रही है । रेणु को जीवन की कठोर वास्तविकताओं और उसकी गतिमयता में अखण्ड विश्वास है । हमारा लोक जीवन चाहे जितना भी गरीब और अशिक्षित हो जाय, परन्तु उसके पास लोक संस्कृति की कुबेर सम्पदा है । यह लोक जीवन विपत्रि, अभाव और गरीबी में भी अपना धन उदात्त हाथों से उलीचता रहता है । किन्तु आज यही लोक संस्कृति विलुप्त होती जा रही है जो निःसन्देह चिन्तनीय है ।

रसप्रिया कहानी में लोक संस्कृति और आँचलिकता का गहरा रंग साफ–साफ दिखता है । मिरदंगिया को रसप्रिया के लिए जो प्यास है वह वास्तव में कहानी कार के मन में लोक संस्कृति की प्यास का सूचक है । मिरदंगिया लोक गीत को जीवित रखना चाहता है और इसलिए वह मोहना के तान पर अभिभूत हो जाता है । इस जमाने में भी इतनी शुद्ध रसप्रिया गानेवाला कहीं कोई है, और वह है मोहना । वह मोहना पर मन प्राणों से निछावर हो जाना चाहता है, क्योंकि वही उसकी परम्परा को बढ़ाने वाला भविष्य है । इस परम्परा को बचाने के लिए ही मिरदंगिया अपनी गाढी कमाई के चालीस रुपए मोहना को दे देता है । रागबद्ध, लयबद्ध जीवन की खोज उसे मोहना तक पहुँचा देती है, जहाँ नई पीढ़ी के गतिमय जीवन में वह अपने विश्वास को खड़ा करता है । मोहना में वह राग और संगीत की अपनी सारी नस्ल की पहचान करता है । वह नहीं जानता है कि मोहना उसका बेटा है, फिर भी अपन्त्व की चुम्बकीय शक्ति उसे मोहना की ओर खींच रही है । यह आकर्षण पिता और पुत्र का नहीं है, बल्कि एक कलाकार का नई पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य के लिए उत्पन्न आकर्षण है, जब मिरदंगिया कहता है कि अब से मैं पदावली नहीं, रसप्रिया नहीं, निरगुण गाऊँगा । तो यह एक प्रकार से अगली पीढ़ी में सही गुण पाकर संतुष्ट पिछली पीढ़ी का वानप्रस्थ ग्रहण जैसा लगता है । इस कलाकार को अपनी कला पर नाज है । जिस लोक संस्कृति को सामंती समाज व्यवस्था के पोषक लोग मन बहलाव की चीज मानते हैं उसपर लोक कलाकारों को स्वाभिमान ही नहीं गर्व भी है । मगर जब ऐसे स्वाभिमानी कलाकार पर लांछन के पत्थर फेंके जाते हैं तो उसका स्वाभिमान आहत हो उठता है । रेणु लिखते हैं कि मिरदंगिया के मन की झाँपी में कुँडली मार कर सोया हुआ साँप फन फैलाकर फुफकार उठा, एस्साला मारेंगे वह तमाचा कि…। कलाकार भूखा नंगा रह सकता है, लेकिन अपना अपमान बर्दास्त नहीं कर सकता । इसलिए तो मोहना जैसे गुणी बालक को भी मिरदंगिया गाली दे बैठता है और उसे मारने के लिए भी तैयार हो जाता है । इससे यह जाहिर होता है कि रेणु लोक संस्कृति का अपमान नहीं सह सकते । रसप्रिया में रेणु ने जगह–जगह पर लोकगीतों का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया है । लोकगीत की इन पंक्तियों को कहानी के बीच में डालकर कहानी के सौन्दर्य को और भी निखार दिया है रेणु ने । ये पंक्तियाँ कहानी में अवरोध उत्पन्न नहीं करती बल्कि उसे आगे बढ़ाने में सहायता ही प्रदान करती है । आँचलिक रस्म रिवाज और संस्कृति को चित्रित करने में रेणु सफल हैं । रसप्रिया के पाठक के सपने में मिरदंगिया आज भी विदापत का गीत गुनगुनाता है ।