मुकदमा - Aksharang
  • २०७८ मंसिर १३ सोमबार

मुकदमा

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

मुकदमा चलते दो साल हो गये परन्तु तारीख पर तारीख के अलावा अभी तक कुछ नही मिला । अलबत्ता हर तारीख पर वकील साहब अपनी फीस वसूलते तो उनके मुंशी जी दरख्वास्त, कोर्ट फीस,पेशकार को घूस के नाम पर जेब खाली करा लेता । फिर भी मुकदमा जस का तस । जिस आक्रोश और गुस्से में आकर यश और नेहा ने अदालत में तलाक की अर्जी दाखिल की थी वह आक्रोश और गुस्सा भी तारीख के थपेड़ों से ठंडा पड़ चुका था । दोनो के मन मे कई बार आया कि अच्छी खासी जिंदगी चल रही थी,यहां अदालत के चक्कर मे आकर कहा फंस गए ।

तलाक मांगने का कारण भी आपस में मामूली गिले शिकवो भरी मामूली बाते थी, इन मामूली सी बातों को बढ़ा–चढ़ा कर रिश्तेदारों ने बड़ा बना दिया था । यश ने किसी बात पर गुस्से में आकर नेहा को बददिमाग बोल दिया, बदले में नेहा ने भी यश को बदसूरत बोल दिया ।

दोनो चाहते तो चुप रहकर या फिर मुँह से गलत बात निकल जाने का बहाना कर मामले को रफा–दफा कर देते, परन्तु दोनो ने झुकना अपनी तौहीन समझा,ऊपर से रिश्तेदारों ने आग में घी डालकर उसे और पेचीदा बना दिया,

न सिर्फÞ पेचीदा बल्कि संगीन भी, सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि अपने पति को कोई औरत इतना गलत कह दे तो फिर उसके साथ रहना असम्भव है ।

कुछ रिश्तेदारों ने यह भी पश्चाताप जाहिर किया कि ऐसी औरतों को घर में रखना, अपने शरीर में मियादी बुखार पालते रहने जैसा है ।
बुरी बातें तेजी से बढ़ती है, सो दोनों तरफ खूब आरोप उछाले गए । ऐसा लगता था जैसे दोनों पक्षों के लोग आरोपों का ट्वेन्टी ट्वेन्टी खेल रहे हो । यश ने नेहा के बारे में और नेहा ने यश के बारे में कई आरोप प्रत्यारोप लगाए।तभी तो बात मुकदमे तक जा पहुंची ।

मुकदमा दर्ज कराया गया । यश ने नेहा की चरित्रहीनता का, तो नेहा ने यश पर दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया । छह साल तक शादीशुदा जीवन बिताने और एक बच्ची के माता–पिता होने के बाद आज दोनों में तलाक का मुकदमा चल रहा है । दोनों अपने अपने वकीलों के साथ आमने सामने खड़े थे । सुलह सफाई का भी नतीजा सिफर ही रहा ।

यह बात नेहा की सहेली हिना को पता चली तो वह एक दिन उनसे मिलने कोर्ट ही आ गई । अपने भीतर की नफरत और गुस्से को छिपाते हुए नेहा और यश हिना को चाय पिलाने कैंटीन ले गए । वहां हिना ने दोनों को कुरेदा तो दोनों चुप रहे, एकदम शांत जैसे कुछ हुआ ही न हो । हिना ने सवाल दागा फिर यह मुकदमा दो साल से क्यो चल रहा है ? दो साल से आप दोनो अलग क्यो रह रहे हो ? दोनों ने एक दूसरे को देखा जैसे चकमक पत्थर आपस में रगड़ खा गए हों । दोनों गुस्से से भर उठे । दोनों में बदले की भावना का आवेश था । ऐसा पहली बार नही हुआ जब वे दोनों पति–पत्नी कोर्ट में दाखिल होते है तो तब भी एक–दूसरे को देख कर मुँह फेर लेते है । दोनों को उनके वकीलों द्वारा अच्छा–खासा सबक सिखाया जाता कि उन्हें क्या कहना है । दोनों वही कहते भी थे । कई बार दोनों के वक्तव्य कहानी झूठी होने के कारण बदलने लगते । लेकिन फिर सँभल जाते ।

इसी दांव पेंच में दो साल बीत गए परन्तु मुकदमा ज्यो का त्यों ?

हिना ने पूछा, ‘तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है ?’

पहले तो दोनों चुप रहे फिर

यश बोला, ‘मैं नही नेहा बताएगी ।’

नेहा ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर थोड़ी देर बाद चुप्पी तोड़ते हुए बोली, ‘तुमने मुझे चरित्रहीन कहा था, अच्छा हुआ, अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा ।’

यश बोला, ‘वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था!’
‘मैंने बहुत मानसिक तनाव झेली है’, नेहा की आवाजÞ सपाट थी न दुःख, न गुस्सा ।

यश ने कहा, ‘जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहूलुहान कर देता है । तुम बहुत उज्ज्वल हो । मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी । मुझे बेहद अफÞसोस है ।’

नेहा चुप रही, उसने एक बार यश को देखा । कुछ पल चुप रहने के बाद यश ने गहरी साँस ली । कहा, ‘तुमने भी तो मुझे दहेज का लोभी कहा था । ‘गलत कहा था ।’ यश की ओरÞ देखती हुई नेहा बोली ।

कुछ देर चुप रही फिर बोली, ‘मैं कोई और आरोप लगाती लेकिन मैं इतना गिर नही सकती ।’

तभी चाय आ गई ।

हिना के आग्रह पर यश ने चाय उठाई, चाय जÞरा–सी छलकी । गर्म चाय उसके हाथ पर गिरी, तो नेहा के मुहं से अचानक स्सी की आवाजÞ निकली ।
नेहा ने यश को देखा । फिर दोनों एक दूसरे को देखे जा रहे थे ।
‘तुम्हारा कमर दर्द कैसा है ?’

‘ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम ।’ नेहा ने बात खत्म करनी चाही ।

‘तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती ।’ यश ने कहा तो नेहा फीकी हँसी हँस दी ।

‘तुम्हारे अस्थमा की क्या कंडीशन है, फिर अटैक तो नहीं पड़े ?’ नेहा ने पूछा ।
‘अस्थमा, डाक्टर सूरी ने स्ट्रेन, मेंटल स्ट्रेस कम करने को कहा है ।’ यश ने जानकारी दी ।

फिर नेहा ने यश को देखा, और देखती रही एकटक । जैसे पुरुष के चेहरे पर छपे तनाव को पढ़ रही हो ।

‘इनहेलर तो लेते रहते हो न ?’ नेहा ने यश से पूछा ।

‘हाँ, लेता रहता हूँ । आज लाना याद नहीं रहा ।’

‘तभी आज तुम्हारी साँस उखड़ी–उखड़ी–सी है ।’ नेहा ने हमदर्दी भरे लहजे में कहा ।

‘हाँ, कुछ इस वजह से और कुछ ।’ यश कहते–कहते रुक गया ।
‘कुछ–कुछ तनाव के कारण, नेहा ने बात पूरी की ।

यश कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ‘तुम्हें चार लाख रुपए भी तो देने हैं और छह हजÞार रुपए महीना भी ।अदालत का आदेश जो हुआ है ।’
‘हाँ‘ फिर ?’ नेहा ने पूछा ।

‘वसुंधरा में फ्लैट है, तुम्हें तो पता है । मैं उसे तुम्हारे नाम कर देता हूँ ।’
‘चार लाख रुपए फिलहाल मेरे पास नहीं है ।’ यश ने अपने मन की बात कही ।

‘वसुंधरा वाले फ्लैट की कीमत तो बीस लाख रुपए होगी ? मुझे सिर्फ चार लाख रुपए चाहिए ।’ नेहा ने स्पष्ट किया ।

‘बिटिया बड़ी होगी, सौ खर्च होते हैं ।’ यश ने कहा ।

‘वो तो तुम छह हजÞार रुपए महीना मुझे देते रहोगे ।’ नेहा बोली ।

‘हाँ, जÞरूर दूँगा ।’

‘चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना ।’ नेहा ने कहा ।

उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी ।

यश उसका चेहरा देखता रहा ।

कितनी सहृदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी नेहा जिसे कभी वह ब्याह कर लाया था ।

नेहा भी यश को देख रही थी और सोच रही थी। कितना सरल स्वभाव का है यह , जो कभी उसे ब्याहकर ले गया था । कितना प्यार करता था मुझसे । एक बार हरिद्वार में जब वह गंगा में स्नान कर रही थी तो उसके हाथ से जंजीर छूट गई । तो यश पागलों की तरह उसे बचाने चला आया था । जबकि खुद तैरना नहीं आता था लाट साहब को और मुझे बचाने की कोशिशें करता रहा, कितना अच्छा है, मैं ही बेवजह इसमें खोट निकालती रही ।’

यश एकटक नेहा को देख रहा था और सोच रहा था, ‘कितना ध्यान रखती थी, स्टीम के लिए पानी उबाल कर जग में डाल देती । उसके लिए हमेशा इनहेलर खरीद कर लाती, सेरेटाइड आक्यूहेलर बहुत महँगा था । हर महीने कंजूसी करती, पैसे बचाती, और आक्यूहेलर खरीद लाती । दूसरों की बीमारी की कौन परवाह करता है ? ये करती थी परवाह । कभी जाहिर भी नहीं होने देती थी । कितनी संवेदना थी इसमें और मैं अपने अहंकार के नशे में रहा ।

काश, मैं इसके जजÞ्बे को समझ पाता ।

दोनों चुप थे, बेहद चुप ।

दुनिया भर की आवाजÞों से मुक्त हो कर, खामोश ।

दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे ।

‘मुझे एक बात कहनी है ।’ यश की आवाजÞ में झिझक थी ।

‘कहो ।’ नेहा ने सजल आँखों से उसे देखा ।

‘डरता हूँ ।’ यश ने कहा ।

‘डरो मत । हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो, पत्नी ने कहा ।

‘तुम बहुत याद आती रही ।’ यश बोला ।

‘तुम भी ।’ नेहा ने कहा ।

‘मैं तुम्हें अब भी प्रेम करता हूँ ।’

‘मैं भी ।’ नेहा ने कहा ।

दोनों की आँखें कुछ जÞ्यादा ही सजल हो गई थीं ।

दोनों की आवाजÞ जजÞ्बाती और चेहरे मासूम ।

‘क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते ?’ नेहा ने पूछा ।

‘कौन सा मोड़ ?’

‘हम फिर से साथ–साथ रहने लगें, एक साथ । फिर से अच्छे पति–पत्नी बन

कर । बहुत अच्छे दोस्त बन कर ।

‘और ये मुकदमा ?’ नेहा ने पूछा ।

‘खत्म देते हैं ।’ यश ने कहा औरÞ दोनो चल दिये मुकदमा वापस लेने ।

अदालत ने भी वही किया,जो उन्होंने चाहा, यानि दो साल का मुकदमा दो मिनट में खत्म । दोनों उठ खड़े हुए । एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर मुस्कराए । हिना भी खुश थी दोनो को एक होता देखकर ।