वसंत - Aksharang
  • २०७७ असोज ३ शनिवार

वसंत

बसन्त चौधरी

विचित्र है अक्षरों का बगीचा !
पल्लवित न होने पर भी
पेड़ पौधे ग्रीष्म की आग में खिल जाते हैं
हँसता हुआ आ जाता है वसंत,
ठंड को चिरते हुए प्रकट हो जाता है
अनायास वसंत !

अनेक होते हुए भी ऋतुओं के नाम
सुबह शाम, किसी भी समय
लगा करता है इस बगीचे में
वसंत का मेला अनन्त ! अनन्त !

कैसा मीठापन !
संयोग की हँसी के बदले
विरह के आँसू में
और अधिक मधुमय होता है
वसंत !

यदाकदा
आँधी–तुफानों के प्रलयंकारी बवंडर में भी
मुझे अचम्भित करते हुए फटकारता है
वसंत !

एह ही है ईच्छा मेरे अन्तःस्करण की कि
समाधिस्थ योगी के दिव्य मस्तक तुल्य
वसंतमय हो यह बगीचा–
यह अक्षरों का बगीचा–
जगाते हुए जीवन–जगत्
किट–पतंगपर्यन्त
पल–प्रतिपल, अविरल, अविराम !
अनन्त ! अनन्त !
(बसंत चौधरी की कवितासंग्रह ‘वसंत’ से साभार)